वाणी मनुष्य का वह दर्पण है जिसमें संस्कार, विचार, शिक्षा और चरित्र दिखाई देता है।"
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 03 अगस्त ::
परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। संसार की प्रत्येक वस्तु समय के साथ बदलती है। ऋतुएँ बदलती हैं, नदियाँ अपना मार्ग बदलती हैं, वृक्ष पुराने पत्ते छोड़कर नए पल्लव धारण करते हैं और मनुष्य भी अपने परिवेश, अनुभव तथा आवश्यकताओं के अनुसार, स्वयं को बदलता रहता है। यही परिवर्तन जीवन की गति है और इसी के कारण सृष्टि का चक्र निरंतर चलता रहता है। यदि परिवर्तन न हो तो विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
मनुष्य भी प्रकृति का ही अंश है। इसलिए उसके जीवन में भी परिवर्तन स्वाभाविक है। समय के साथ उसके रहन-सहन, खान-पान, पहनावे, तकनीक, शिक्षा और जीवन-शैली में बदलाव आता है। कभी बैलगाड़ी से यात्रा करने वाला समाज आज अंतरिक्ष तक पहुँच चुका है। कभी संदेश कबूतरों के माध्यम से भेजे जाते थे, आज एक क्लिक में दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँच जाते हैं। यह परिवर्तन मानव सभ्यता की उपलब्धि है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
प्रश्न यह उठता है कि क्या हर परिवर्तन विकास कहलाता है? क्या केवल नया होना ही श्रेष्ठ होने का प्रमाण है? क्या आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना है? क्या प्रगति की दौड़ में अपनी पहचान खो देना भी बुद्धिमत्ता है? यहीं से एक गंभीर बहस प्रारम्भ होती है।
परिवर्तन तब तक शुभ है जब तक वह जीवन को बेहतर बनाए। लेकिन जब परिवर्तन हमारी आत्मा, हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार और हमारे नैतिक मूल्यों को प्रभावित करने लगे, तब वह परिवर्तन नहीं बल्कि विकृति बन जाता है। यदि कोई व्यक्ति आधुनिक तकनीक अपनाता है तो यह विकास है। यदि कोई नई भाषा सीखता है तो यह ज्ञान का विस्तार है। यदि कोई नए विचारों को अपनाता है तो यह बौद्धिक प्रगति है। लेकिन यदि आधुनिकता के नाम पर वह अपने माता-पिता का सम्मान करना छोड़ दे, बड़ों से संवाद की मर्यादा भूल जाए, अपनी भाषा को हीन समझने लगे, अपनी संस्कृति का उपहास उड़ाने लगे और अभद्रता को आत्मविश्वास समझने लगे, तो यह प्रगति नहीं बल्कि पतन का संकेत है। आज समाज इसी दोराहे पर खड़ा दिखाई देता है।
सभ्यता और संस्कृति केवल मंदिर, मस्जिद, त्योहार, वेशभूषा या भोजन तक सीमित नहीं होती है। उनका सबसे बड़ा परिचय मनुष्य का व्यवहार होता है। किसी समाज की पहचान उसके ऊँचे भवनों से नहीं होती है, बल्कि उसके लोगों की भाषा, विनम्रता, पारिवारिक संबंधों और नैतिकता से होती है।
भारत हजारों वर्षों से "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश देता आया है। यहाँ "मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः, आचार्यदेवो भवः" केवल श्लोक नहीं है बल्कि जीवन का दर्शन रहा है। यही कारण है कि भारतीय परिवारों में बच्चों को सबसे पहले नमस्कार करना, बड़ों का सम्मान करना, मधुर भाषा बोलना और संयम रखना सिखाया जाता था। यही संस्कार हमारी असली पूँजी थे।
भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती है। भाषा व्यक्ति के संस्कारों का दर्पण होती है। किसी व्यक्ति का परिचय उसके वस्त्रों से पहले उसकी वाणी देती है। यदि शब्दों में विनम्रता है तो सामने वाला स्वतः सम्मान देने लगता है। यदि शब्दों में कटुता है तो सबसे बड़ा ज्ञान भी प्रभावहीन हो जाता है। भारतीय संस्कृति ने सदैव मधुर वाणी को सर्वोच्च स्थान दिया है। कबीरदास ने लिखा है कि "ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।।" यह केवल कविता नहीं है बल्कि सामाजिक जीवन का नियम है। आज आवश्यकता इसी शिक्षा को पुनः समझने की है।
समय के साथ परिवारों का स्वरूप भी बदल गया है। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है। दादा-दादी की कहानियाँ मोबाइल स्क्रीन ने छीन ली। आँगन में होने वाली पारिवारिक बैठकों का स्थान सोशल मीडिया ने ले लिया। अब बच्चों का सबसे बड़ा शिक्षक परिवार नहीं है बल्कि इंटरनेट बनता जा रहा है। जो शब्द पहले घर में सुनाई देते थे, उनकी जगह अब सोशल मीडिया की भाषा ने ले ली है। यही सबसे बड़ी चिंता का विषय है।
भाषा का विकास स्वाभाविक प्रक्रिया है। हर युग में नए शब्द जुड़ते हैं। लेकिन आज स्थिति केवल नए शब्दों तक सीमित नहीं है। अब भाषा में मर्यादा की जगह आक्रामकता, संवाद की जगह तर्क-वितर्क और सम्मान की जगह व्यंग्य बढ़ता जा रहा है। "जी" शब्द धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। सम्मानजनक संबोधन की जगह "अरे यार", "अबे", "भाई", "यो", "ब्रो", "ड्यूड" जैसे शब्द सामान्य होते जा रहे हैं। मित्रों के बीच यह सामान्य लग सकता है, लेकिन यही भाषा जब माता-पिता, शिक्षकों और बुजुर्गों तक पहुँचती है, तब चिंता स्वाभाविक हो जाती है।
समाज का परिवर्तन केवल शब्दों में नहीं, सोच में भी दिखाई देता है। एक समय था जब बच्चे अपने पिता को "बाबूजी" या "पिताजी" कहकर संबोधित करते थे। फिर "पापा जी" आया। उसके बाद केवल "पापा" रह गया। आज अनेक स्थानों पर "डैड", "डैडी" और कई बार "अरे यार पापा" जैसे संबोधन भी सामान्य होते जा रहे हैं। यह केवल संबोधन का परिवर्तन नहीं है। यह उस मानसिक दूरी का संकेत है जो धीरे-धीरे संबंधों की गरिमा को प्रभावित कर रही है। समस्या अंग्रेज़ी शब्दों के प्रयोग में नहीं है। समस्या सम्मान के कम होते भाव में है। यदि "डैड" कहते हुए भी सम्मान बना रहे तो कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन यदि "पिताजी" कहकर भी अपमान किया जाए तो वह भारतीय संस्कृति नहीं कहलाएगी। अर्थात शब्द नहीं, भाव सबसे महत्वपूर्ण है।
"राम" और "राम जी" में अंतर केवल एक शब्द का नहीं है, बल्कि भाव का है। "माँ" और "माँ जी" में केवल उच्चारण का अंतर नहीं, बल्कि आदर का विस्तार है। इसी प्रकार "शिक्षक" और "गुरुजी", "दादा" और "दादाजी", "चाचा" और "चाचाजी"—इन सभी संबोधनों में भारतीय संस्कृति की आत्मा बसती है। यदि आधुनिकता के नाम पर सम्मानसूचक शब्द समाप्त होने लगें, तो यह केवल भाषा का परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का भी क्षय है।
भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि "माता प्रथम गुरु होती है।" इसके बाद पिता, परिवार और समाज बच्चे के शिक्षक बनते हैं। बच्चे को बोलना कोई विद्यालय नहीं सिखाता; वह घर से सीखता है। जब दादी कहानी सुनाते हुए कहती थीं कि "बेटा, बड़ों का आदर करना चाहिए", तो वह केवल कहानी नहीं होती थी, बल्कि जीवन का पाठ होता था। जब पिता अतिथि के सामने खड़े होकर उनका स्वागत करते थे, तब बच्चा सम्मान का अर्थ समझता था। जब माँ पड़ोसियों से मधुर भाषा में बात करती थी, तब बच्चा संवाद की कला सीखता था। आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। संयुक्त परिवार कम होते जा रहे हैं। माता-पिता दोनों कार्यरत हैं। बच्चों का अधिक समय मोबाइल, टैबलेट और इंटरनेट के साथ बीतता है। ऐसे में उनकी भाषा पर परिवार से अधिक सोशल मीडिया का प्रभाव पड़ने लगा है।
एक समय था जब बच्चे पंचतंत्र, रामायण, महाभारत, प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर और विवेकानंद को पढ़कर बड़े होते थे। आज अनेक बच्चे दिन की शुरुआत और अंत मोबाइल स्क्रीन से करते हैं। रील्स, शॉर्ट वीडियो, गेमिंग चैट और वायरल कंटेंट उनके नए शिक्षक बन चुके हैं। यहाँ समस्या तकनीक नहीं है। समस्या यह है कि बिना किसी सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रस्तुत की जा रही भाषा बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ रही है। अभद्र संवाद, व्यंग्य, अपशब्द, त्वरित प्रतिक्रिया, ट्रोल संस्कृति और दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार का हिस्सा बनती जा रही है।
आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को काट देना नहीं है। जापान आज विश्व की सबसे आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन वहाँ आज भी बच्चे अपने माता-पिता और शिक्षकों के प्रति गहरा सम्मान रखते हैं। दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और अनेक विकसित देशों ने आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान भी बचाकर रखी है। फिर भारत क्यों अपनी ही संस्कृति को पिछड़ेपन का प्रतीक मानने लगा? यह प्रश्न सभी के सामने खड़ा है।
हर पीढ़ी अपने समय की उपज होती है। आज का युवा जिस वातावरण में पल रहा है, वही उसके व्यक्तित्व का निर्माण कर रहा है। यदि मोबाइल, सोशल मीडिया, वेब सीरीज, रील्स और वायरल कंटेंट उसके आदर्श बन जाएँ, तो उसके व्यवहार पर उनका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। इसलिए केवल युवाओं को दोष देना उचित नहीं होगा। परिवार, शिक्षा व्यवस्था, समाज, मीडिया और डिजिटल मंच, सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
आज आवश्यकता किसी पीढ़ी को कटघरे में खड़ा करने की नहीं है, बल्कि आत्ममंथन करने की है। क्या हमने बच्चों को समय दिया? क्या हमने उन्हें संस्कार दिए? क्या हमने स्वयं वैसा आचरण किया, जैसा उनसे अपेक्षा करते हैं? यदि उत्तर 'नहीं' है, तो सुधार की शुरुआत स्वयं से करनी होगी।
परिवर्तन जीवन का नियम है, लेकिन परिवर्तन तभी कल्याणकारी है जब वह जड़ों को मजबूत करे, उन्हें काटे नहीं। आधुनिकता और संस्कृति एक-दूसरे की विरोधी नहीं है, बल्कि पूरक हो सकती हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि विज्ञान के साथ विवेक, तकनीक के साथ संस्कार और प्रगति के साथ परंपरा का संतुलन बनाए रखा जाए।
आज जब भाषा बदल रही है, संबंध बदल रहे हैं और सामाजिक व्यवहार भी नए रूप ले रहा है, तब यह तय करना होगा कि केवल आधुनिक बनना चाहते हैं या आधुनिक होने के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक आत्मा को भी सुरक्षित रखना चाहते हैं।
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