परीक्षा व्यवस्था में भरोसा लौटाना समय की जरूरत
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 23 अगस्त ::
भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से बदलाव की मांग कर रही है। देश में स्कूलों और विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी है, उच्च शिक्षा के अवसरों का विस्तार हुआ है और डिजिटल तकनीक ने पढ़ाई के तौर-तरीकों को बदल दिया है। इसके बावजूद परीक्षा प्रणाली को लेकर विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों के मन में अनेक सवाल बने हुए हैं। पेपर लीक, नकल, परीक्षा परिणामों में देरी, तकनीकी गड़बड़ियां, अलग-अलग परीक्षाओं के अलग मानक और प्रतियोगी परीक्षाओं का बढ़ता दबाव जैसी चुनौतियों ने परीक्षा व्यवस्था में विश्वास को प्रभावित किया है। ऐसे समय में केंद्र सरकार की ओर से परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की पहल महत्वपूर्ण मानी जानी चाहिए। उद्यमी और तकनीक की दुनिया के जाने-माने विशेषज्ञ नंदन नीलेकनी के नेतृत्व में विशेषज्ञ टीम को भारतीय परीक्षा प्रणाली में सुधार और विश्वास बहाल करने के लिए सुझाव देने की जिम्मेदारी दिया जाना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल केवल परीक्षा के तौर-तरीकों में बदलाव तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसका लक्ष्य शिक्षा व्यवस्था में ऐसी समानता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता स्थापित करना होना चाहिए, जिसमें देश के हर विद्यार्थी को अपनी प्रतिभा साबित करने का समान अवसर मिले।
नंदन नीलेकनी का नाम तकनीक, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और बड़े स्तर की प्रणालियों के निर्माण से जुड़ा रहा है। परीक्षा व्यवस्था भी अब केवल प्रश्नपत्र छापने और परीक्षा केंद्रों तक सीमित नहीं रह गई है। यह एक विशाल डिजिटल और प्रशासनिक प्रणाली बन चुकी है, जिसमें लाखों विद्यार्थियों का पंजीकरण, पहचान सत्यापन, परीक्षा केंद्रों का प्रबंधन, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, ऑनलाइन आवेदन, मूल्यांकन और परिणाम शामिल हैं। इसलिए परीक्षा सुधार में तकनीकी विशेषज्ञता की भूमिका बढ़ गई है। लेकिन तकनीक को समाधान का एक हिस्सा मानना होगा, पूरा समाधान नहीं। परीक्षा प्रणाली का संबंध विद्यार्थी की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि, स्कूल की गुणवत्ता, शिक्षक की उपलब्धता, भाषा, इंटरनेट सुविधा और परिवार की आर्थिक क्षमता से भी है। इसलिए विशेषज्ञ समिति को तकनीक और शिक्षा, दोनों को साथ लेकर चलना होगा।
परीक्षा सुधार की चर्चा अक्सर पेपर लीक या नकल रोकने तक सीमित हो जाती है। निश्चित रूप से प्रश्नपत्र की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन परीक्षा व्यवस्था की समस्याएं इससे कहीं बड़ी हैं। मान लीजिए किसी परीक्षा में पेपर लीक नहीं हुआ, लेकिन परीक्षा केंद्र दूर-दराज के क्षेत्र में है, किसी विद्यार्थी के पास गुणवत्तापूर्ण तैयारी के साधन नहीं हैं और किसी दूसरे विद्यार्थी ने महंगे कोचिंग संस्थान से तैयारी की है। दोनों को एक जैसा प्रश्नपत्र मिलने के बावजूद उनके अवसर समान नहीं कहे जा सकते। यही कारण है कि परीक्षा में समानता स्थापित करने का अर्थ केवल समान प्रश्नपत्र देना नहीं, बल्कि समान अवसर उपलब्ध कराना भी है।
आज एक बड़ी समस्या यह है कि कई बार शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान अर्जित करने के बजाय परीक्षा पास करना बन जाता है। विद्यार्थी पाठ्यक्रम को समझने के बजाय संभावित प्रश्नों की तैयारी करने लगते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अलग कोचिंग व्यवस्था विकसित हो गई है। इससे दो समानांतर व्यवस्थाएं बनती दिखाई देती हैं- एक औपचारिक शिक्षा व्यवस्था और दूसरी परीक्षा-केंद्रित तैयारी व्यवस्था। इस अंतर को कम करना जरूरी है। यदि स्कूल और कॉलेज विद्यार्थियों को तार्किक सोच, समस्या समाधान, विश्लेषण, रचनात्मकता और विषय की वास्तविक समझ विकसित करने में सक्षम बनाएं, तो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बोझ भी कम हो सकता है।
देश में कोचिंग संस्थानों का विस्तार अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब विद्यार्थी को यह विश्वास होने लगे कि बिना महंगी कोचिंग के वह किसी बड़ी परीक्षा में सफल नहीं हो सकता है। यह धारणा सामाजिक असमानता को बढ़ा सकती है। शहरों में रहने वाले और आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों के विद्यार्थियों को बेहतर कोचिंग, टेस्ट सीरीज, डिजिटल सामग्री और विशेषज्ञ शिक्षकों तक पहुंच मिल सकती है। दूसरी ओर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थी सीमित संसाधनों के साथ तैयारी करते हैं। इसलिए परीक्षा सुधार के साथ सार्वजनिक शिक्षा की गुणवत्ता मजबूत करना भी आवश्यक है।
भारत विविधताओं का देश है। यहां अलग-अलग भाषाएं, सामाजिक परिस्थितियां, आर्थिक स्तर और शैक्षिक संसाधन हैं। ऐसी स्थिति में परीक्षा व्यवस्था को ऐसा बनाया जाना चाहिए कि विविधता प्रतिभा के रास्ते में बाधा न बने। भाषा के प्रश्न पर भी संवेदनशील दृष्टिकोण जरूरी है। विद्यार्थियों को अपनी सुविधा और परीक्षा की प्रकृति के अनुरूप पर्याप्त भाषाई विकल्प मिलने चाहिए। प्रश्नों का अनुवाद केवल शब्दों का अनुवाद न होकर अर्थ की समानता सुनिश्चित करने वाला होना चाहिए। इसी तरह दिव्यांग विद्यार्थियों, दूर-दराज के क्षेत्रों के विद्यार्थियों और डिजिटल संसाधनों से वंचित छात्रों की जरूरतों को भी सुधार प्रक्रिया में शामिल करना होगा।
भविष्य की परीक्षा व्यवस्था में तकनीक की भूमिका निश्चित रूप से बढ़ेगी। ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल पहचान, कंप्यूटर आधारित परीक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी और डिजिटल मूल्यांकन जैसी व्यवस्थाएं परीक्षा को अधिक तेज और पारदर्शी बना सकती हैं। लेकिन तकनीक के साथ नए जोखिम भी आते हैं। साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता, सर्वर की विश्वसनीयता, तकनीकी खराबी और डिजिटल विभाजन जैसी चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए डिजिटल परीक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिसमें तकनीकी गड़बड़ी होने पर विद्यार्थी को नुकसान न उठाना पड़े। तकनीक का उद्देश्य परीक्षा को कठिन बनाना नहीं, निष्पक्ष बनाना होना चाहिए।
विद्यार्थियों के लिए परीक्षा की तारीखों में अनिश्चितता भी बड़ी समस्या है। परीक्षा कब होगी, परिणाम कब आएगा, काउंसलिंग कब होगी और प्रवेश कब मिलेगा। इन सवालों के स्पष्ट उत्तर नहीं मिलने पर विद्यार्थी और अभिभावक मानसिक दबाव में रहते हैं। एक भरोसेमंद राष्ट्रीय परीक्षा कैलेंडर इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है। यदि प्रमुख परीक्षाओं की तारीखें पहले से तय हों और उनमें अनावश्यक बदलाव न हो, तो विद्यार्थी बेहतर योजना बनाकर तैयारी कर सकेंगे।
परीक्षा का परिणाम केवल अंक नहीं है। वह विद्यार्थी के भविष्य के कई दरवाजे खोलता या बंद करता है। इसलिए मूल्यांकन प्रणाली में विश्वसनीयता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। मूल्यांकन में मानवीय त्रुटियों को कम करने, उत्तर पुस्तिकाओं की सुरक्षित जांच, पुनर्मूल्यांकन की स्पष्ट व्यवस्था और शिकायत निवारण की पारदर्शी प्रणाली आवश्यक है। विद्यार्थी को यह विश्वास होना चाहिए कि यदि उसके साथ कोई गलती हुई है तो वह अपनी बात प्रभावी ढंग से रख सकता है और उसकी शिकायत पर निष्पक्ष कार्रवाई होगी।
देश में परीक्षा केंद्रों की संख्या और गुणवत्ता में भी काफी अंतर है। महानगरों में आधुनिक सुविधाओं वाले केंद्र उपलब्ध हैं, जबकि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं भी कई बार चुनौती बन जाती है। परीक्षा केंद्रों के लिए न्यूनतम राष्ट्रीय मानक तय किए जा सकते हैं। बिजली, इंटरनेट, सुरक्षा, बैठने की व्यवस्था, शौचालय, दिव्यांग अनुकूल सुविधाएं और आपातकालीन व्यवस्थाओं को अनिवार्य मानकों में शामिल किया जाना चाहिए।परीक्षा प्रणाली को बदलने के साथ शिक्षक व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर्मचारी नहीं है, बल्कि विद्यार्थी की सीखने की प्रक्रिया के प्रमुख आधार हैं। यदि शिक्षक को आधुनिक शिक्षण तकनीकों, मूल्यांकन पद्धतियों और डिजिटल उपकरणों का प्रशिक्षण दिया जाए, तो शिक्षा का स्तर स्वाभाविक रूप से बेहतर होगा। शिक्षक प्रशिक्षण को भी परीक्षा सुधार की व्यापक योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रटने की प्रवृत्ति है। विद्यार्थी यदि किसी विषय को समझने के बजाय केवल याद करके परीक्षा में लिखता है, तो शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। नई परीक्षा प्रणाली में ऐसे प्रश्नों को बढ़ावा देना चाहिए जो विद्यार्थी की समझ, विश्लेषण, तर्क और समस्या समाधान क्षमता की जांच करें। इससे परीक्षा में सफलता का अर्थ केवल याददाश्त नहीं, बल्कि वास्तविक ज्ञान और क्षमता बन सकेगा। भारत में कई विद्यार्थियों के लिए एक परीक्षा जीवन-मरण का प्रश्न बन जाती है। किसी एक परीक्षा में असफल होना उनके लिए पूरे भविष्य को अंधकारमय महसूस करा सकता है। इस मानसिक दबाव को कम करने के लिए परीक्षा प्रणाली में अधिक अवसर, पारदर्शी पुनर्परीक्षा और कौशल आधारित विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। विद्यार्थी का भविष्य किसी एक दिन, किसी एक प्रश्नपत्र या कुछ घंटों की परीक्षा से पूरी तरह निर्धारित नहीं होना चाहिए।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में केंद्र और राज्यों, दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा सुधार करते समय राज्यों के अनुभवों और जरूरतों को भी शामिल करना होगा। राज्यों के शिक्षा विभाग, विश्वविद्यालय, परीक्षा संस्थाएं, शिक्षक संगठन, विद्यार्थी प्रतिनिधि और विशेषज्ञ, सभी की राय इस प्रक्रिया को अधिक व्यापक बना सकती है। सुधार ऊपर से नीचे थोपा हुआ मॉडल न होकर व्यापक परामर्श पर आधारित होना चाहिए। आधुनिक परीक्षा व्यवस्था में डेटा का उपयोग बेहतर निर्णय लेने के लिए किया जा सकता है। परीक्षा के परिणामों, प्रश्नों की कठिनाई, विषयवार प्रदर्शन, क्षेत्रीय असमानता और विद्यार्थियों की सफलता के पैटर्न का विश्लेषण कर शिक्षा व्यवस्था में कमजोरियों की पहचान की जा सकती है। लेकिन डेटा के उपयोग के साथ निजता और सुरक्षा का ध्यान रखना भी अनिवार्य होगा। विद्यार्थी का व्यक्तिगत डेटा केवल आवश्यक उद्देश्य के लिए और सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए।
किसी भी परीक्षा व्यवस्था की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना यह है कि विद्यार्थी और समाज उस पर कितना भरोसा करते हैं। यदि विद्यार्थी को विश्वास है कि प्रश्नपत्र सुरक्षित है, परीक्षा निष्पक्ष है, मूल्यांकन पारदर्शी है और शिकायत का समाधान संभव है, तो परीक्षा प्रणाली मजबूत मानी जाएगी। इसके विपरीत यदि हर परीक्षा के बाद संदेह, विवाद और आरोप सामने आएं, तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसलिए नीलेकनी के नेतृत्व वाले उच्च-स्तरीय कार्यबल के सामने केवल प्रशासनिक सुधार की नहीं, बल्कि विश्वास निर्माण की बड़ी चुनौती है। भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी में से एक है। यह युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी पूंजी है। लेकिन प्रतिभा तभी राष्ट्रीय शक्ति बन सकती है जब उसे निष्पक्ष अवसर मिले। शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में समानता का अर्थ यह नहीं कि हर विद्यार्थी को बिल्कुल एक जैसी परिस्थितियां मिलें। इसका अर्थ यह है कि किसी विद्यार्थी की आर्थिक स्थिति, क्षेत्र, भाषा या संसाधनों की कमी उसकी प्रतिभा को अनावश्यक रूप से दबा न दे। यही वह दृष्टिकोण है जिसे व्यापक शिक्षा सुधार का आधार बनाया जाना चाहिए।
नीलेकनी के नेतृत्व में विशेषज्ञ टीम को परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की सिफारिश करने का अवसर मिला है। इस अवसर को केवल पेपर लीक रोकने, परीक्षा केंद्रों की निगरानी या डिजिटल व्यवस्था लागू करने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसे शिक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा से जोड़ना चाहिए। स्कूल से विश्वविद्यालय तक शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम, मूल्यांकन, प्रतियोगी परीक्षाएं, कोचिंग संस्कृति, डिजिटल पहुंच और सामाजिक-आर्थिक असमानता, इन सभी मुद्दों को एक साथ देखने की जरूरत है। भारत को ऐसी परीक्षा प्रणाली चाहिए जिसमें विद्यार्थी प्रश्नपत्र से डरने के बजाय अपनी क्षमता दिखाने के लिए परीक्षा दे। ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें अभिभावक परिणाम को लेकर आशंकित होने के बजाय प्रणाली पर भरोसा कर सके। ऐसी शिक्षा चाहिए जिसमें शहर और गांव, अमीर और गरीब तथा अलग-अलग भाषाई पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों को आगे बढ़ने का समान अवसर मिले। नीलेकनी के नेतृत्व वाला कार्यबल इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन इसकी सिफारिशों की वास्तविक सफलता उनके लागू होने और जमीन पर परिणाम देने से तय होगी। परीक्षा सुधार केवल परीक्षा का सुधार नहीं है। यह देश के भविष्य में विश्वास बहाल करने का अभियान है।
यदि शिक्षा में समान अवसर और परीक्षा में समान न्याय स्थापित हो जाए, तो भारत की युवा प्रतिभा को नई ऊंचाई मिल सकती है। यही समय है कि परीक्षा को केवल चयन का माध्यम नहीं, बल्कि निष्पक्ष अवसर, ज्ञान और प्रतिभा के उत्सव में बदला जाए। भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जहां विद्यार्थी की सफलता उसकी पहुंच, पैसे या प्रभाव से नहीं, बल्कि उसकी मेहनत, क्षमता और प्रतिभा से तय हो। यही वास्तविक शिक्षा सुधार होगा और यही एक मजबूत, समान तथा विश्वासपूर्ण भारत की आधारशिला भी बनेगा।
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