शिव भक्ति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का पावन पर्व है सावन मास : पंडित शंभूनाथ झा
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 31 जुलाई ::
हिन्दू धर्म में सावन मास को भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र और फलदायी समय माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस पूरे महीने भगवान शिव अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं और उनकी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। यही कारण है कि देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है और श्रद्धा, भक्ति तथा आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
अंतरराष्ट्रीय फेस रीडर एवं प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित शंभूनाथ झा के अनुसार, सावन मास भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इस दौरान भगवान शिव पृथ्वी लोक पर विचरण कर अपने भक्तों के दुखों का निवारण करते हैं। उन्होंने बताया कि इस पवित्र माह में रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है, जिसका उल्लेख वेदों और पुराणों में विस्तार से मिलता है।
पंडित शंभूनाथ झा बताते हैं कि यजुर्वेद में रुद्राभिषेक की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। रुद्राभिषेक केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम भी है। श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किया गया रुद्राभिषेक भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होता है और साधक को सुख, समृद्धि तथा सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, बेलपत्र, धतूरा, भांग, चंदन और पुष्प अर्पित करते हुए 'ॐ नमः शिवाय' तथा श्री रुद्रम का जाप करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रुद्राभिषेक करने से जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं। यह अनुष्ठान ग्रह दोषों की शांति, रोगों से मुक्ति, मानसिक तनाव में कमी, परिवार में सुख-शांति तथा आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
मान्यता है कि भगवान शिव अपने भक्तों के भाव देखते हैं। यदि कोई श्रद्धालु सच्चे मन से केवल जल अर्पित कर भी शिव का स्मरण करता है, तो महादेव उसकी प्रार्थना अवश्य स्वीकार करते हैं। इसी कारण सावन में शिवालयों में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व माना गया है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय निकले विष को भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। इसके बाद देवताओं ने उनके शरीर की जलन शांत करने के लिए जलाभिषेक किया। तभी से सावन मास में जल अर्पित करने और शिव की विशेष पूजा करने की परंपरा प्रचलित हुई। इसी माह में लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा कर पवित्र नदियों से जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। यह यात्रा आस्था, अनुशासन और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है।
ज्योतिषाचार्य पंडित शंभूनाथ झा के अनुसार, रुद्राभिषेक करते समय शुद्धता, संयम और श्रद्धा का विशेष महत्व है। पूजा से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करते समय यह ध्यान रखें कि वह खंडित न हो। पूजा के दौरान क्रोध, अहंकार और नकारात्मक विचारों से दूर रहकर भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए। उन्होंने बताया कि रुद्राभिषेक केवल इच्छापूर्ति का साधन नहीं है, बल्कि आत्मिक शांति और ईश्वर से जुड़ने का श्रेष्ठ माध्यम भी है।
उन्होंने बताया कि सावन केवल पूजा-पाठ का महीना नहीं है, बल्कि जीवन में सदाचार, संयम, दया और सेवा की भावना अपनाने का भी अवसर है। भगवान शिव को 'भोलेनाथ' कहा जाता है क्योंकि वे सरलता और निष्कपट भक्ति से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए इस माह में जरूरतमंदों की सहायता, वृक्षारोपण, गौसेवा और समाजहित के कार्य भी विशेष पुण्यदायी माने गए हैं।
सावन मास भगवान शिव की आराधना का सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है। इस पावन माह में श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया रुद्राभिषेक भक्तों के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है। पंडित शंभूनाथ झा के अनुसार भगवान शिव सच्ची आस्था और निष्काम भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। इसलिए सावन के इस पवित्र अवसर पर प्रत्येक श्रद्धालु को भगवान शिव का स्मरण करते हुए सदाचार, सेवा और आध्यात्मिक साधना का मार्ग अपनाना चाहिए। महादेव की कृपा से जीवन की अनेक कठिनाइयां दूर होती हैं और व्यक्ति को आत्मबल, सकारात्मकता तथा नई ऊर्जा प्राप्त होती है।
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