जीवन - हर क्षण सामने खड़ा एक मौन प्रश्न

जीवन - हर क्षण सामने खड़ा एक मौन प्रश्न

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 30 अगस्त ::

जीवन को समझने की कोशिश मनुष्य की सबसे पुरानी जिज्ञासाओं में से एक है। हम अक्सर पूछते हैं कि जीवन का अर्थ क्या है? क्यों जन्म मिला? किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए? सफलता किसे कहें और संतुष्टि कहां मिलेगी? इन प्रश्नों के उत्तर खोजते-खोजते मनुष्य ने दर्शन, अध्यात्म, विज्ञान और साहित्य की विशाल परंपराएं खड़ी कर दी। फिर भी जीवन का कोई ऐसा एक सूत्र सामने नहीं आया, जिसे हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू किया जा सके। वास्तविकता यही है कि जीवन का अर्थ हर व्यक्ति और हर क्षण के लिए अलग-अलग होता है। किसी के लिए परिवार जीवन का केंद्र है, तो किसी के लिए समाज सेवा। किसी के लिए ज्ञान साधना है, किसी के लिए कर्म ही पूजा है। किसी के लिए संघर्ष ही जीवन का विद्यालय है और किसी के लिए प्रेम ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि। इसलिए जीवन को किसी एक परिभाषा में बांधना संभव नहीं है। जीवन एक ऐसी यात्रा है जिसमें रास्ते भी बदलते हैं और मंजिलों के अर्थ भी।

मनुष्य अपने जीवन को नियंत्रित करने का दावा भले ही करता हो, लेकिन वास्तव में वह जीवन के सामने एक याचक की भूमिका में ही रहता है। हम भविष्य की योजनाएं बनाते हैं, इच्छाएं करते हैं और अपनी पसंद के अनुसार परिस्थितियों को ढालना चाहते हैं। लेकिन जीवन हमेशा हमारी इच्छा के अनुसार नहीं चलता। हम स्वास्थ्य मांगते हैं, समय मांगते हैं, प्रेम मांगते हैं, सफलता चाहते हैं और अपनों का साथ चाहते हैं। लेकिन जीवन कब क्या देगा और कब क्या छीन लेगा, इसका निर्णय हमारे हाथ में नहीं होता है। यही जीवन की सबसे बड़ी विनम्रता है। मनुष्य चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह समय को रोक नहीं सकता है। वह बीते हुए क्षण को वापस नहीं ला सकता है। वह हर घटना को अपनी इच्छा के अनुसार बदल नहीं सकता है। इसलिए जीवन के सामने याचक होना कमजोरी नहीं, बल्कि वास्तविकता को स्वीकार करने की परिपक्वता है।

मनुष्य का जीवन संतुष्टि और असंतुष्टि के बीच झूलता रहता है। जो मिला, उससे कुछ समय के लिए संतोष होता है और फिर मन कुछ नया पाने की इच्छा करने लगता है। यही इच्छा जीवन को गतिशील भी बनाती है और बेचैन भी। धन मिल जाता है तो प्रतिष्ठा की इच्छा होती है। प्रतिष्ठा मिलती है तो अधिक सफलता की चाह पैदा होती है। सफलता के बाद स्थायित्व चाहिए और स्थायित्व के बाद मन शांति तलाशने लगता है। इस प्रकार जीवन में उपलब्धियों की एक लंबी श्रृंखला बनती जाती है, लेकिन भीतर का प्रश्न बना रहता है कि क्या इतना ही पर्याप्त है? यह प्रश्न किसी परीक्षा का प्रश्न नहीं है, जिसका एक सही उत्तर हो। यह आत्ममंथन का प्रश्न है। इसका उत्तर हर व्यक्ति को अपने अनुभवों से खोजना पड़ता है।

जीवन को अगर परीक्षा माना जाए तो इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही होगी कि यहां किसी को भी एक जैसा प्रश्न-पत्र नहीं मिलता है। किसी व्यक्ति के सामने आर्थिक संघर्ष है, किसी के सामने पारिवारिक जिम्मेदारियां। कोई अकेलेपन से जूझ रहा है, कोई असफलता से और कोई अपने ही मन की उलझनों से। बाहर से सुखी दिखाई देने वाला व्यक्ति भी भीतर किसी ऐसे प्रश्न से लड़ रहा हो सकता है, जिसकी जानकारी दुनिया को नहीं है। इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन को देखकर अपने जीवन का मूल्यांकन करना उचित नहीं है। हमें यह समझना होगा कि हर व्यक्ति की परिस्थितियां अलग हैं। उसकी यात्रा अलग है। उसके संघर्ष अलग हैं और उसकी जिम्मेदारियां भी अलग हैं। इसीलिए तुलना जीवन की शांति को नष्ट करती है। दूसरे की सफलता देखकर अपने जीवन को असफल मान लेना उतना ही अनुचित है, जितना किसी दूसरे के संघर्ष को देखकर स्वयं को श्रेष्ठ समझ लेना।

जीवन में कोई भी परिस्थिति केवल घटना नहीं होती है। वह अपने भीतर एक प्रश्न लेकर आती है। असफलता पूछती है कि क्या तुम फिर उठोगे? कठिनाई पूछती है कि क्या तुम्हारा धैर्य अभी जीवित है? वियोग पूछता है कि क्या तुम प्रेम को केवल पाने तक सीमित रखते हो? अभाव पूछता है कि क्या तुम उपलब्ध संसाधनों में भी अपना रास्ता बना सकते हो? सफलता पूछती है कि क्या तुम विनम्र रह सकते हो? और जिम्मेदारी पूछती है कि क्या तुम अपने कर्तव्य से भागोगे या उसे स्वीकार करोगे? इन प्रश्नों के उत्तर शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से देने पड़ते हैं।

जीवन के प्रश्नों का कोई तैयार उत्तर नहीं मिलता है। लेकिन मनुष्य के पास चार बड़ी शक्तियां हैं- साहस, धैर्य, प्रेम और कर्म। साहस हमें कठिन परिस्थितियों के सामने खड़ा होना सिखाता है। धैर्य हमें समय के साथ चलना सिखाता है। प्रेम हमें कठोर परिस्थितियों में भी मनुष्य बने रहने की शक्ति देता है। और कर्म हमें निष्क्रियता से बाहर निकालकर आगे बढ़ने का रास्ता देता है। सिर्फ परिस्थितियों को दोष देने से जीवन नहीं बदलता। परिवर्तन तब शुरू होता है जब व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि परिस्थितियां जैसी भी हों, उनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया का चुनाव वह स्वयं कर सकता है। यही मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता है।

जीवन की कठिनाइयों को हम अक्सर अभिशाप समझ लेते हैं। लेकिन कठिनाइयां कई बार हमारे भीतर छिपी उस शक्ति को सामने लाती हैं, जिसके बारे में हमें स्वयं भी पता नहीं होता है। जब सब कुछ सहज होता है, तब हमारी क्षमता की परीक्षा नहीं होती है। वास्तविक शक्ति का परिचय विपरीत परिस्थितियों में मिलता है। जिस व्यक्ति ने कभी अंधेरे का सामना नहीं किया, उसे प्रकाश का मूल्य शायद उतना समझ नहीं आएगा। जिसने कभी असफलता नहीं देखी, वह सफलता की वास्तविक कीमत कैसे समझेगा? इसलिए कठिनाइयों से भागने के बजाय उनसे सीखना चाहिए। हर कठिन परिस्थिति हमें भीतर से कुछ सिखाकर जाती है, जैसे- धैर्य, विवेक, आत्मविश्वास, सहनशीलता या जीवन की नई समझ। कभी-कभी जीवन हमें उस दिशा में ले जाने के लिए पुराने रास्ते बंद करता है, जिस दिशा में जाने का साहस हम स्वयं नहीं कर पाते हैं।

आधुनिक समाज में जीवन को सुख, धन और सफलता के पैमाने से मापने की प्रवृत्ति बढ़ी है। बड़ा घर, अच्छी गाड़ी, आर्थिक संपन्नता, प्रतिष्ठा और सामाजिक पहचान को सफलता का प्रमाण माना जाता है। इनका अपना महत्व है, लेकिन इन्हें जीवन का अंतिम अर्थ मान लेना उचित नहीं है। धन सुविधा दे सकता है, लेकिन संतोष नहीं खरीद सकता। सफलता सम्मान दिला सकती है, लेकिन मन की शांति की गारंटी नहीं दे सकती। सुखद परिस्थितियां जीवन को आसान बना सकती हैं, लेकिन जीवन को अर्थपूर्ण बनाने का काम हमारी सोच और कर्म करते हैं। जीवन की सार्थकता इस बात में अधिक है कि जो जिम्मेदारी हमें वर्तमान में मिली है, उसे हम कितनी ईमानदारी से निभाते हैं।

हर व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी रूप में जिम्मेदारियां आती है। माता-पिता की जिम्मेदारी, परिवार की जिम्मेदारी, समाज के प्रति जिम्मेदारी, अपने कार्य के प्रति जिम्मेदारी और सबसे बढ़कर स्वयं के प्रति जिम्मेदारी। जिम्मेदारी हमेशा सुविधाजनक नहीं होती है। कई बार वह हमारी इच्छाओं के विपरीत होती है। लेकिन जीवन की परिपक्वता यही है कि व्यक्ति केवल अधिकारों की बात न करे, बल्कि अपने कर्तव्यों को भी समझे। जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को बोझ मानता है, उसका जीवन शिकायतों से भर सकता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति जिम्मेदारी को अपने अस्तित्व का हिस्सा मानकर स्वीकार करता है, उसके जीवन में कठिनाइयों के बावजूद एक गहरी संतुष्टि जन्म लेती है।

मनुष्य के लिए शिकायत करना आसान है। परिस्थितियां खराब हो तो हम समय को दोष देते हैं, लोगों को दोष देते हैं, भाग्य को दोष देते हैं और कभी-कभी स्वयं को भी दोषी मानने लगते हैं। लेकिन शिकायत समस्या का समाधान नहीं है। जीवन हमें हर दिन दो रास्ते देता है “शिकायत या जिम्मेदारी”। शिकायत करने वाला पूछता है कि “मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?” जिम्मेदारी स्वीकार करने वाला पूछता है कि “अब मैं क्या कर सकता हूं?” इन दोनों प्रश्नों में जीवन की पूरी दिशा बदल देने की क्षमता है। पहला प्रश्न व्यक्ति को अतीत में रोक देता है, जबकि दूसरा उसे वर्तमान में सक्रिय करता है।

मनुष्य अक्सर या तो बीते हुए समय में जीता है या आने वाले भविष्य की चिंता करता है। लेकिन जीवन वास्तव में वर्तमान में घटित होता है। बीता हुआ समय अनुभव बन चुका है और आने वाला समय अभी संभावना है। हमारे हाथ में केवल वर्तमान है। इसलिए वर्तमान में मिली जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाना ही जीवन की सबसे व्यावहारिक साधना है। आज किसी की सहायता करनी है तो आज करें। परिवार को समय देना है तो आज दें। कोई आवश्यक काम पूरा करना है तो आज शुरू करें। किसी से प्रेम व्यक्त करना है तो उसे अनिश्चित भविष्य के लिए न टालें। क्योंकि जीवन का सबसे निश्चित क्षण वही है, जिसमें हम अभी सांस ले रहे हैं।

जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसके अस्तित्व का अर्थ दूसरों से भी जुड़ा हुआ है। किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना, किसी दुखी व्यक्ति को सहारा देना, अपने अनुभव से किसी को रास्ता दिखाना, परिवार के लिए त्याग करना या समाज के लिए कुछ उपयोगी करना, ये सभी जीवन को अर्थ प्रदान करते हैं। कई बार जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि वह नहीं होती जिसे दुनिया तालियों से स्वीकार करे। वह छोटी-सी मदद भी हो सकती है, जिसके बारे में किसी को पता तक न चले, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन थोड़ा बेहतर हो जाए। यही निस्वार्थ कर्म जीवन को भीतर से समृद्ध करता है।

जीवन हमेशा हमारी पसंद का नहीं होगा। इसमें सुख भी आएगा और दुख भी। मिलन होगा तो बिछोह भी होगा। सफलता होगी तो असफलता भी आएगी। प्रशंसा मिलेगी तो आलोचना भी होगी। जीवन की परिपक्वता इन विरोधाभासों को स्वीकार करने में है। स्वीकार करने का अर्थ हार मान लेना नहीं है। इसका अर्थ है कि वास्तविकता को पहचानकर उसके भीतर अपने कर्म का रास्ता खोजना। जो व्यक्ति जीवन से केवल सुख की अपेक्षा करता है, वह दुख आते ही टूट सकता है। लेकिन जो व्यक्ति जीवन को उसके संपूर्ण रूप में स्वीकार करता है, वह कठिन समय में भी संतुलित रह सकता है।

अंततः जीवन का अर्थ शायद किसी बड़ी उपलब्धि में नहीं है, बल्कि उन छोटे-छोटे उत्तरों में छिपा है जो हम रोज जीवन के प्रश्नों को देते हैं। हर सुबह एक नया प्रश्न लेकर आती है। हर परिस्थिति हमें कुछ सिखाती है। हर संबंध हमारी परीक्षा लेता है। हर कठिनाई हमारी शक्ति को जगाती है और हर जिम्मेदारी हमें अपने अस्तित्व का अर्थ समझाती है। जीवन हमें प्रश्न-पत्र देता रहेगा। प्रश्न बदलते रहेंगे। परिस्थितियां बदलती रहेगी। उम्र बदलती रहेगी। लोगों की भूमिका बदलती रहेगी। लेकिन हमारे पास हमेशा एक विकल्प रहेगा कि हम परिस्थितियों से शिकायत करें या उन्हें जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करके अपना उत्तर दें। शायद जीवन का प्रथम और अंतिम सूत्र यही है कि जीवन से शिकायत करने के बजाय जीवन को जिम्मेदारी की तरह स्वीकार किया जाए। जब मनुष्य यह सीख लेता है, तब सुख मिलने पर अहंकार नहीं होता, दुख आने पर निराशा नहीं होती, सफलता मिलने पर घमंड नहीं होता और असफलता आने पर जीवन व्यर्थ नहीं लगता। तब जीवन केवल घटनाओं की श्रृंखला नहीं रहता। वह एक सतत साधना बन जाता है कि अपने भीतर को समझने की, अपने कर्तव्य को निभाने की और हर नए प्रश्न का उत्तर साहस, धैर्य, प्रेम और कर्म से देने की। यही शायद जीवन का सबसे सरल, सबसे कठिन और सबसे सच्चा अर्थ है कि जो मिला है उसे स्वीकार करना, जो करना है उसे ईमानदारी से करना और जो सामने आए उसका सामना मनुष्य बने रहकर करना।
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