भाजपा नई पीढ़ी को साधने के लिए विचारधारा बदलेगी या शैली?
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 22 अगस्त ::
“भाजपा का डीएनए जेन-जी और जेन-अल्फा वाला नहीं है। उनको साथ लेने की कोशिश में भेस बदलने का मतलब वैसा ही है, जैसा गैर-भाजपा पार्टियों का सॉफ्ट हिंदुत्व।” यह टिप्पणी भारतीय राजनीति में एक बड़े सवाल की ओर संकेत करती है कि क्या राजनीतिक दल अपनी मूल विचारधारा और पहचान को बनाए रखते हुए नई पीढ़ी को अपने साथ जोड़ सकते हैं? या फिर युवा मतदाताओं की बदलती पसंद, भाषा और जीवनशैली के अनुरूप उन्हें अपनी राजनीतिक शैली में बड़ा बदलाव करना पड़ेगा? आज जेन-जी यानि जनरेशन जेड और आने वाली जेन-अल्फा भारतीय राजनीति के लिए केवल नए मतदाता समूह नहीं हैं। ये ऐसे सामाजिक समूह हैं जिनका दुनिया को देखने का नजरिया पिछली पीढ़ियों से काफी अलग है। इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वैश्विक संस्कृति और त्वरित सूचना इनके जीवन का हिस्सा हैं। इनके लिए राजनीति केवल भाषण, रैली और चुनावी घोषणापत्र तक सीमित नहीं है।
जेन-जी और जेन-अल्फा के लिए राजनीतिक संवाद का तरीका बदल चुका है। लंबा भाषण सुनने के बजाय वे कुछ सेकंड के वीडियो, मीम, शॉर्ट्स, पॉडकास्ट और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए राजनीतिक विचारों से परिचित होते हैं। यह पीढ़ी सवाल पूछती है। वह राजनीतिक दावों को तुरंत स्वीकार नहीं करती, बल्कि अलग-अलग स्रोतों से उनकी जांच भी करती है। रोजगार, शिक्षा, महंगाई, तकनीक, पर्यावरण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, डिजिटल अधिकार और जीवन की गुणवत्ता जैसे मुद्दे उसके लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए किसी राजनीतिक दल के सामने चुनौती केवल यह नहीं है कि वह युवाओं तक पहुंचे, बल्कि यह भी है कि वह युवाओं से किस भाषा में संवाद करे।
भारतीय जनता पार्टी की राजनीति की पहचान लंबे समय से राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, संगठनात्मक अनुशासन और मजबूत नेतृत्व जैसे तत्वों से जुड़ी रही है। यही उसकी राजनीतिक पहचान और समर्थक आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। भाजपा के लिए इसलिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि नई पीढ़ी को आकर्षित करने के प्रयास में वह अपनी मूल पहचान को कितना बदल सकती है। युवाओं तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया की भाषा अपनाना एक बात है और अपनी वैचारिक पहचान बदलना दूसरी। आधुनिक संचार तकनीक, नए प्रचार माध्यम और युवाओं के अनुरूप राजनीतिक प्रस्तुति अपनाना किसी भी दल के लिए स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन यदि बदलाव इतना अधिक हो जाए कि मूल पहचान ही धुंधली पड़ने लगे, तो वह राजनीतिक रणनीति के बजाय पहचान के संकट का रूप ले सकता है।
“भेस बदलने” का अर्थ यहां राजनीतिक शैली को पूरी तरह बदल देने से है। किसी दल का अपनी भाषा को सरल बनाना, युवाओं से संवाद के लिए नए माध्यम अपनाना या नए मुद्दों को प्राथमिकता देना भेस बदलना नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक दल केवल मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अपनी मूल वैचारिक स्थिति से अलग दिखने का प्रयास करता है। युवा मतदाता राजनीतिक संदेशों में बनावटीपन को जल्दी पकड़ लेते हैं। सोशल मीडिया के दौर में किसी नेता के पुराने बयान, पुराने वीडियो और पुराने राजनीतिक रुख कुछ ही मिनटों में सामने आ सकते हैं। इसलिए आज राजनीति में विश्वसनीयता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
भारतीय राजनीति में गैर-भाजपा दलों द्वारा समय-समय पर हिंदू धार्मिक प्रतीकों, मंदिर यात्राओं या धार्मिक आयोजनों के प्रति सार्वजनिक रूप से अधिक सक्रिय रुख अपनाने को अक्सर “सॉफ्ट हिंदुत्व” की राजनीति के रूप में देखा गया है। इसके पीछे चुनावी गणित भी रहा है। जब किसी पार्टी को लगता है कि समाज में धार्मिक पहचान का प्रभाव बढ़ रहा है, तो वह अपने राजनीतिक संदेश को उसी के अनुरूप ढालने की कोशिश कर सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या मतदाता इसे स्वाभाविक राजनीतिक परिवर्तन मानता है या चुनावी मजबूरी? यही प्रश्न भाजपा के सामने भी अलग रूप में मौजूद है। यदि पार्टी जेन-जी और जेन-अल्फा को आकर्षित करने के लिए अपनी भाषा, पहनावा, सोशल मीडिया व्यवहार और राजनीतिक प्रस्तुति बदलती है, तो क्या वह बदलाव वास्तविक पीढ़ीगत संवाद होगा या केवल चुनावी रणनीति?
नई पीढ़ी को केवल वोट बैंक के रूप में देखना राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी भूल हो सकती है। जेन-जी रोजगार चाहती है। वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहती है। वह डिजिटल अर्थव्यवस्था में अवसर चाहती है। वह स्टार्टअप, कौशल, नई तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दुनिया में आगे बढ़ना चाहती है। उसे यह भी जानना है कि आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उसकी नौकरी को कैसे प्रभावित करेगा। वह पूछती है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार कहां मिलेगा? छोटे शहरों के युवाओं को महानगरों जैसी सुविधाएं कब मिलेंगी? इंटरनेट की पहुंच, डिजिटल सुरक्षा और ऑनलाइन स्वतंत्रता का भविष्य क्या होगा? इन सवालों के जवाब केवल सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं दिए जा सकते।
भाजपा के सामने चुनौती जितनी बड़ी है, अवसर भी उतना ही बड़ा है। पार्टी के पास देशव्यापी संगठन, डिजिटल पहुंच और मजबूत राजनीतिक नेतृत्व की वजह से युवा पीढ़ी तक पहुंचने के पर्याप्त साधन हैं। जरूरत इस बात की है कि युवा मतदाता को केवल प्रचार का लक्ष्य न बनाया जाए, बल्कि नीति निर्माण और राजनीतिक संवाद में वास्तविक भागीदारी दी जाए। युवाओं को पार्टी कार्यक्रमों में बुलाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह महसूस होना चाहिए कि उनकी समस्याएं राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा हैं।
युवा राजनीति को केवल इंस्टाग्राम, यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय होकर नहीं जीता जा सकता। सोशल मीडिया माध्यम है, राजनीति का विकल्प नहीं है। किसी नेता का युवा दिखना और युवा मुद्दों को समझना दो अलग बाते हैं। आज की पीढ़ी किसी नेता की उम्र से ज्यादा उसके विचारों की प्रासंगिकता देख सकती है। यदि कोई वरिष्ठ नेता रोजगार, तकनीक, शिक्षा और भविष्य की अर्थव्यवस्था पर प्रभावी ढंग से बात करता है, तो युवा उससे जुड़ सकते हैं। दूसरी ओर, कोई युवा नेता यदि केवल ट्रेंडिंग भाषा बोलता है लेकिन ठोस मुद्दों पर स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं रखता, तो उसका आकर्षण सीमित हो सकता है।
किसी भी राजनीतिक दल के सामने समय के साथ यह चुनौती आती है कि वह अपनी मूल विचारधारा को कायम रखते हुए बदलते समाज के अनुरूप खुद को कैसे विकसित करे। विचारधारा स्थिर हो सकती है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति स्थिर नहीं रह सकती। आज से कुछ दशक पहले राजनीतिक संदेश पोस्टर, अखबार और जनसभाओं से पहुंचता था। फिर टेलीविजन आया। उसके बाद इंटरनेट और सोशल मीडिया ने राजनीतिक संचार को बदल दिया। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस राजनीतिक संवाद को एक नया रूप दे रही है। इसलिए भाजपा को जेन-जी और जेन-अल्फा तक पहुंचने के लिए अपनी विचारधारा छोड़ने की जरूरत नहीं है। जरूरत यह समझने की है कि उस विचारधारा को नई पीढ़ी के सवालों और नई भाषा से कैसे जोड़ा जाए।
नई पीढ़ी के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ भी केवल सीमा, सेना और सुरक्षा तक सीमित नहीं हो सकता। उसके लिए दुनिया में भारत की आर्थिक स्थिति, तकनीकी क्षमता, खेल, विज्ञान, अंतरिक्ष, शिक्षा और रोजगार भी राष्ट्र की शक्ति के प्रतीक हैं। यदि भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत करता है, नई तकनीकों में नेतृत्व करता है और युवाओं के लिए अवसर पैदा करता है, तो यह भी आधुनिक राष्ट्रवाद की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति बन सकती है। भाजपा के लिए यह क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके पारंपरिक राष्ट्रवादी विमर्श को भविष्य की अर्थव्यवस्था और युवा आकांक्षाओं से जोड़ने की बड़ी संभावना मौजूद है।
हिंदुत्व भाजपा की राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन नई पीढ़ी के बीच किसी भी विचारधारा की स्वीकार्यता उसके व्यावहारिक अर्थ से भी जुड़ती है। युवा यह जानना चाहता है कि सांस्कृतिक पहचान उसके दैनिक जीवन से कैसे जुड़ती है। वह अपनी परंपरा और आधुनिकता के बीच संघर्ष के बजाय दोनों का संतुलन चाहता है। यहां भाजपा के सामने अवसर है कि वह सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक भारत के विकास, विज्ञान, तकनीक और उद्यमिता के साथ जोड़कर प्रस्तुत करे। नई पीढ़ी को आकर्षित करने के लिए केवल युवाओं जैसी भाषा बोलना या सोशल मीडिया पर लोकप्रिय बनने की कोशिश पर्याप्त नहीं होगी।राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा प्रामाणिकता की है। यदि किसी नेता की डिजिटल छवि और जमीन पर उसकी राजनीति में बड़ा अंतर दिखाई देता है, तो युवा मतदाता उस अंतर को पहचान सकता है। इसलिए युवाओं के साथ संवाद में दिखावे से अधिक निरंतरता और विश्वसनीयता की आवश्यकता होगी।
जेन-जी अभी राजनीति में सक्रिय रूप से प्रवेश कर रही पीढ़ी है, लेकिन जेन-अल्फा के लिए राजनीतिक दुनिया और भी अलग होगी। यह वह पीढ़ी है जो बचपन से ही डिजिटल उपकरणों, एआई, वर्चुअल दुनिया और व्यक्तिगत डिजिटल अनुभवों के बीच बड़ी हो रही है। आने वाले वर्षों में उसके राजनीतिक सवाल भी आज से अलग होंगे। नौकरी का स्वरूप बदल सकता है। शिक्षा की व्यवस्था बदल सकती है। राजनीतिक अभियान कृत्रिम बुद्धिमत्ता और व्यक्तिगत डेटा पर आधारित हो सकते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों को केवल पुराने मुद्दों के नए संस्करण से काम नहीं चलेगा। भाजपा के लिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि वह जेन-जी जैसी दिखे या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या वह जेन-जी और जेन-अल्फा की आकांक्षाओं को समझती है। राजनीतिक दल को अपने मूल सिद्धांतों से समझौता किए बिना नई पीढ़ी के प्रश्नों का उत्तर देना होगा। यदि वह रोजगार, शिक्षा, तकनीक, उद्यमिता, पर्यावरण, डिजिटल अधिकार और सामाजिक गतिशीलता जैसे विषयों पर विश्वसनीय कार्यक्रम पेश करती है, तो उसे अपनी पहचान छिपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
आज की राजनीति में ब्रांडिंग महत्वपूर्ण हो गई है, लेकिन लोकतंत्र केवल ब्रांडिंग से नहीं चलता है। युवा मतदाता को आकर्षक नारे से कुछ समय के लिए प्रभावित किया जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए नीतियां, परिणाम और भरोसा जरूरी हैं। भाजपा के लिए सबसे प्रभावी रास्ता शायद यही होगा कि वह अपने वैचारिक मूल को कायम रखते हुए उसके भीतर भविष्य की राजनीति के लिए पर्याप्त जगह बनाए। यानी पहचान वही रहे, लेकिन संवाद का तरीका बदले; मूल विचार वही रहें, लेकिन प्राथमिकताओं में नई पीढ़ी के सवाल शामिल हो।
“भाजपा का डीएनए जेन-जी और जेन-अल्फा वाला नहीं है”, इस कथन को केवल राजनीतिक आलोचना के रूप में देखने के बजाय भारतीय राजनीति में हो रहे पीढ़ीगत बदलाव के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है। हर राजनीतिक दल की अपनी वैचारिक विरासत होती है। लेकिन लोकतंत्र में कोई भी दल केवल अपने अतीत के भरोसे भविष्य नहीं जीत सकता। नई पीढ़ी से जुड़ने के लिए उसे भविष्य के सवालों का सामना करना पड़ता है। भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह जेन-जी और जेन-अल्फा के बीच अपनी वैचारिक पहचान बनाए रखते हुए उनके साथ संवाद स्थापित करे। इसके लिए “भेस बदलने” से ज्यादा जरूरी है भाषा बदलना, प्राथमिकताएं समझना और युवाओं को निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी देना। गैर-भाजपा दलों का “सॉफ्ट हिंदुत्व” हो या भाजपा का युवाओं के अनुरूप नया राजनीतिक रूप, दोनों के सामने एक ही कसौटी है, क्या मतदाता बदलाव को वास्तविक मानता है? आखिरकार राजनीति में चेहरा बदला जा सकता है, भाषा बदली जा सकती है और प्रचार का माध्यम भी बदला जा सकता है। लेकिन लंबे समय तक वही राजनीतिक शक्ति टिकती है जो अपने मूल विचारों और बदलते समाज के बीच भरोसे का पुल बना सके। यही पुल भाजपा और नई पीढ़ी के बीच भविष्य की राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा होगा।
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