क्या बिहार से बदल जाएगी भारतीय राजनीति की दिशा?
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 22 जून ::
दुनिया के विभिन्न हिस्सों में युद्ध चल रहे हैं। कहीं मिसाइलें दागी जा रही हैं, कहीं सीमाओं पर सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं और कहीं सत्ता के लिए राजनीतिक संघर्ष अपने चरम पर है। लेकिन इन सबके बीच बिहार में भी एक ऐसी लड़ाई लड़ी जा रही है, जिसके हथियार न तो बंदूकें हैं और न ही टैंक। यह लड़ाई संविधान, सत्ता, राजनीति, नैतिकता और न्यायपालिका के बीच संतुलन की लड़ाई है।
इस संघर्ष के केंद्र में हैं बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश, जो राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र हैं। पहली नजर में यह मामला केवल एक मंत्री के पद पर बने रहने का दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे भारतीय राजनीति के कई गहरे सवाल छिपे हुए हैं। सवाल केवल इतना नहीं है कि दीपक प्रकाश मंत्री बने रहेंगे या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या कोई गैर-विधायक लगातार छह-छह महीने की अवधि के सहारे मंत्री पद पर बना रह सकता है? क्या संविधान इसकी अनुमति देता है? क्या यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है? और सबसे महत्वपूर्ण होगा, क्या सुप्रीम कोर्ट इस पर ऐसी व्याख्या देगा जो भविष्य की राजनीति की दिशा तय कर दे?
बिहार की राजनीति में इस समय जो कुछ घट रहा है, वह केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं है। यह मामला देश के संघीय ढाँचे, मंत्रिपरिषद की संवैधानिक संरचना और राजनीतिक दलों की रणनीतियों से जुड़ा हुआ है। यदि अदालत पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक ठहराती है, तो केवल बिहार सरकार ही कठघरे में नहीं खड़ी होगी, बल्कि देशभर में वर्षों से अपनाई जा रही एक राजनीतिक व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) कहता है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्री नियुक्त किया जाता है लेकिन वह राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं है, तो वह अधिकतम छह माह तक मंत्री रह सकता है। इस अवधि के भीतर उसे विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना आवश्यक है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।
संविधान निर्माताओं ने यह प्रावधान इसलिए रखा था ताकि किसी विशेष परिस्थिति में मुख्यमंत्री या सरकार किसी विशेषज्ञ, अनुभवी व्यक्ति या राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नेता को मंत्री बना सके, भले ही वह तत्काल सदन का सदस्य न हो। लेकिन संविधान निर्माताओं की मूल भावना यह नहीं थी कि इस प्रावधान को स्थायी व्यवस्था बना दिया जाए। यहीं से विवाद शुरू होता है।
दीपक प्रकाश बिहार विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। इसके बावजूद उन्हें मंत्री बनाया गया। संविधान के अनुसार उनके पास छह महीने का समय है। विवाद इस बात को लेकर है कि यदि छह महीने के भीतर वे विधायक या विधान पार्षद नहीं बनते हैं, तो क्या उन्हें फिर से मंत्री नियुक्त किया जा सकता है? कानूनी विशेषज्ञों का एक वर्ग कहता है कि ऐसा करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा। दूसरा वर्ग मानता है कि यदि तकनीकी रूप से पुनर्नियुक्ति संभव है तो सरकार ऐसा कर सकती है। इसी प्रश्न ने मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा दिया है।
भारतीय लोकतंत्र में संविधान की अंतिम व्याख्या का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास है। अदालत का निर्णय केवल वर्तमान विवाद को नहीं सुलझाएगा, बल्कि भविष्य के लिए भी एक मिसाल बनेगा। यदि कोर्ट यह कहता है कि छह महीने बाद पुनर्नियुक्ति संभव नहीं है, तो राजनीतिक दलों की एक बड़ी रणनीति समाप्त हो जाएगी। यदि कोर्ट पुनर्नियुक्ति को वैध मान लेता है, तो भविष्य में कई राज्य सरकारें इस रास्ते का उपयोग कर सकती हैं। यही कारण है कि पूरे देश के राजनीतिक और संवैधानिक विशेषज्ञ इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं।
भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जब गैर-विधायकों को मंत्री या मुख्यमंत्री बनाया गया। सबसे चर्चित उदाहरणों में शामिल हैं ममता बनर्जी का केंद्रीय मंत्री बनना। मनमोहन सिंह का राज्यसभा सदस्य रहते हुए प्रधानमंत्री बनना। अशोक गहलोत और उद्धव ठाकरे सरकारों में कुछ गैर-विधायकों की नियुक्तियाँ। महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में समय-समय पर गैर-विधायक मंत्रियों की नियुक्ति। लेकिन इन सभी मामलों में संबंधित व्यक्तियों ने निर्धारित अवधि के भीतर सदन की सदस्यता प्राप्त कर ली थी। यहीं दीपक प्रकाश का मामला अलग और अधिक संवेदनशील बन जाता है।
1990 के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया था जिसे आज भी इस विषय पर सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001) मामले में अदालत ने कहा था कि कोई व्यक्ति लगातार छह महीने की अवधि पूरी होने के बाद पुनः मंत्री नियुक्त नहीं किया जा सकता यदि वह सदन का सदस्य नहीं बना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 164(4) कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है, बल्कि केवल अस्थायी अपवाद है। इस फैसले को आज दीपक प्रकाश विवाद में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधार माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने कई चुनौतियाँ है। एक ओर सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा का राजनीतिक महत्व है। दूसरी ओर सरकार की संवैधानिक छवि और नैतिक वैधता का प्रश्न है। यदि दीपक प्रकाश को पद से हटाया जाता है, तो गठबंधन की राजनीति प्रभावित हो सकती है। यदि उन्हें बनाए रखने का प्रयास किया जाता है, तो कानूनी संकट गहरा सकता है। इस प्रकार सरकार राजनीतिक और संवैधानिक दोनों मोर्चों पर दबाव में दिखाई देती है।
----------------
0 Response to "क्या बिहार से बदल जाएगी भारतीय राजनीति की दिशा?"
एक टिप्पणी भेजें