शब्दों की मर्यादा ही नेतृत्व की है असली पहचान
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 24 जून ::
मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करने वाली सबसे बड़ी शक्ति उसकी वाणी है। शब्द केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं होते हैं, बल्कि वे व्यक्तित्व का दर्पण, संस्कारों का परिचायक और समाज में व्यक्ति की विश्वसनीयता का आधार भी होते हैं। इतिहास गवाह है कि शब्दों ने युद्ध भी कराए हैं और शांति भी स्थापित की है। एक भाषण ने राष्ट्रों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया है तो एक उकसावे भरे वक्तव्य ने लाखों लोगों को विनाश की आग में झोंक दिया है।
कहा जाता है कि तलवार का घाव भर सकता है, लेकिन शब्दों का घाव अक्सर जीवन भर नहीं भरता। यही कारण है कि जिम्मेदार नेतृत्व की पहली शर्त जिम्मेदार भाषा मानी जाती है। विशेष रूप से जब कोई व्यक्ति किसी महाशक्ति का नेतृत्व कर रहा हो, तब उसके शब्द केवल व्यक्तिगत राय नहीं रह जाते, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति, कूटनीति और वैश्विक स्थिरता को प्रभावित करने वाले कारक बन जाते हैं।
आज विश्व जिस उथल-पुथल, अविश्वास और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है, उसमें कई राजनीतिक नेताओं की भूमिका पर चर्चा होती है। इनमें सबसे चर्चित नाम अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का है। उनके समर्थक उन्हें स्पष्टवादी और निर्भीक नेता बताते हैं, जबकि आलोचक उन्हें गैर-जिम्मेदार, अतिशयोक्तिपूर्ण और अक्सर तथ्यों से परे बयान देने वाला राजनेता मानते हैं।
नेतृत्व केवल सत्ता प्राप्त कर लेने का नाम नहीं है। नेतृत्व का अर्थ है विश्वास अर्जित करना। यह विश्वास व्यक्ति की नीतियों से जितना बनता है, उससे कहीं अधिक उसकी वाणी और व्यवहार से निर्मित होता है। जब कोई नेता बार-बार अपने ही कथनों से पलटता दिखाई देता है, जब उसके वक्तव्यों और वास्तविकताओं में बड़ा अंतर दिखाई देता है, तब उसकी विश्वसनीयता कमजोर होने लगती है। यही कारण है कि विश्व राजनीति में शब्दों का महत्व अत्यंत अधिक माना जाता है।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण लें। उनके भाषणों में दृढ़ता भी होती थी और मर्यादा भी। विरोधी भी उनकी भाषा की गरिमा का सम्मान करते थे। इसी प्रकार नेल्सन मंडेला, महात्मा गांधी और अब्राहम लिंकन जैसे नेताओं ने अपने शब्दों के माध्यम से समाज को जोड़ने का कार्य किया। इसके विपरीत जब भाषा में अहंकार, अतिशयोक्ति, असत्य या उकसावे का तत्व बढ़ जाता है, तब वह नेतृत्व को मजबूत करने के बजाय कमजोर करने लगता है।
बड़बोलापन केवल एक व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है। जब यह किसी प्रभावशाली व्यक्ति में दिखाई देता है, तब यह सामाजिक और राजनीतिक संकट का कारण बन सकता है। बड़बोले व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वह हर विषय पर अंतिम सत्य बोलने का दावा करता है। उसे लगता है कि उसकी हर बात सही है और उसे किसी तथ्य, प्रमाण या विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं है। राजनीति में यह प्रवृत्ति और भी खतरनाक हो जाती है क्योंकि लाखों लोग उस व्यक्ति की बातों को गंभीरता से लेते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप पर उनके आलोचक यही आरोप लगाते रहे हैं कि वे कई बार तथ्यों से अधिक भावनाओं और सनसनी को प्राथमिकता देते हैं। चुनावी सभाओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक उनके कई बयान विवाद का कारण बने हैं। समस्या केवल बयान देने की नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब उन बयानों के कारण देशों के बीच अविश्वास बढ़ने लगता है।
आधुनिक राजनीति में प्रचार का महत्व बढ़ गया है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। अब एक बयान कुछ ही मिनटों में पूरी दुनिया तक पहुंच जाता है। लेकिन जब प्रचार सत्य से बड़ा हो जाए, तब लोकतंत्र के सामने संकट खड़ा हो जाता है।
अमेरिका सहित कई देशों में यह बहस लंबे समय से चल रही है कि क्या राजनीतिक लाभ के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है। ट्रंप के कार्यकाल में यह चर्चा विशेष रूप से तेज हुई थी। आलोचकों का कहना है कि जब कोई नेता बार-बार ऐसी बातें कहता है जिनकी पुष्टि नहीं हो पाती, तब धीरे-धीरे समाज में सत्य और असत्य का अंतर धुंधला होने लगता है। यह स्थिति केवल राजनीति के लिए नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए भी खतरनाक है।
दुनिया में अमेरिका केवल एक देश नहीं है बल्कि एक महाशक्ति है। उसकी आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक शक्ति का प्रभाव लगभग हर महाद्वीप पर दिखाई देता है। इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति के शब्दों का महत्व किसी सामान्य राजनीतिक नेता से कहीं अधिक होता है। जब अमेरिका का राष्ट्रपति किसी देश के बारे में टिप्पणी करता है, किसी युद्ध के बारे में बयान देता है या किसी समझौते को लेकर अपनी राय व्यक्त करता है, तो उसके परिणाम वैश्विक स्तर पर दिखाई देते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपतियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी से करें।
मध्य पूर्व लंबे समय से वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील क्षेत्र रहा है। यहां किसी भी प्रकार की राजनीतिक या सैन्य हलचल का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ता है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है। लेकिन जब दोनों पक्षों के नेताओं के बयान तीखे हो जाते हैं, तब स्थिति और जटिल हो जाती है। ईरान के नेताओं ने कई बार अमेरिकी नीतियों और धमकियों की आलोचना की है। दूसरी ओर अमेरिका भी ईरान पर विभिन्न आरोप लगाता रहा है। ऐसे माहौल में यदि कोई नेता उत्तेजक भाषा का प्रयोग करता है, तो कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं कमजोर पड़ने लगती हैं। युद्ध अक्सर हथियारों से नहीं, शब्दों से शुरू होते हैं।
अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान युद्ध नहीं बल्कि संवाद है। यही कारण है कि जेनेवा, वियना और न्यूयॉर्क जैसे शहर वैश्विक कूटनीति के महत्वपूर्ण केंद्र माने जाते हैं। जब दो विरोधी पक्ष बातचीत की मेज पर बैठते हैं, तो दुनिया को उम्मीद होती है कि संघर्ष कम होगा और समाधान निकलेगा। लेकिन यदि किसी पक्ष की बयानबाजी ऐसी हो जो दूसरे पक्ष को अपमानजनक लगे, तो वार्ता प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। कूटनीति का मूल सिद्धांत यही है कि शब्दों का प्रयोग पुल बनाने के लिए किया जाए, दीवारें खड़ी करने के लिए नहीं।
आम तौर पर माना जाता है कि बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति अधिक परिपक्व, संतुलित और धैर्यवान होता है। राजनीतिक जीवन में भी अनुभव को एक बड़ी पूंजी माना जाता है। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी देखने को मिलता है कि लंबे अनुभव के बावजूद व्यक्ति की भाषा में संयम नहीं आता है। यहीं से आलोचना शुरू होती है। जनता नेताओं से केवल निर्णय क्षमता की अपेक्षा नहीं करती है बल्कि नैतिक उदाहरण प्रस्तुत करने की भी अपेक्षा करती है।
आज की राजनीति में विचारधाराओं की जगह व्यक्तित्वों का महत्व बढ़ता जा रहा है। राजनीतिक दलों से अधिक नेताओं की व्यक्तिगत छवि चर्चा का विषय बनती है। इस प्रवृत्ति का एक दुष्परिणाम यह है कि संस्थाएं कमजोर और व्यक्ति मजबूत होने लगते हैं। जब पूरा राजनीतिक विमर्श किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमने लगे, तब उसके व्यक्तिगत गुण और दोष दोनों का प्रभाव पूरे राष्ट्र पर पड़ता है। यदि वह व्यक्ति संतुलित और जिम्मेदार है तो लाभ होता है, लेकिन यदि उसमें अतिशयोक्ति, अहंकार या असत्य का तत्व अधिक है, तो उसके दुष्परिणाम भी व्यापक होते हैं।
किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान उसका पद नहीं, उसकी वाणी होती है। शब्द व्यक्ति के चरित्र, संस्कार और सोच को उजागर करते हैं। यही शब्द संबंध बनाते हैं और यही संबंध तोड़ते भी हैं। विश्व राजनीति के वर्तमान दौर में यह बात और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। जब दुनिया युद्धों, आर्थिक संकटों और कूटनीतिक तनावों से जूझ रही हो, तब नेताओं के शब्द शांति का मार्ग भी बना सकते हैं और संघर्ष की आग भी भड़का सकते हैं। डोनाल्ड ट्रंप हों या कोई अन्य वैश्विक नेता, इतिहास अंततः उनके भाषणों की ऊंचाई नहीं बल्कि उनके शब्दों की विश्वसनीयता, जिम्मेदारी और मानवता के प्रति प्रतिबद्धता को याद रखेगा। किसी भी नेता की वास्तविक शक्ति उसके पद में नहीं, बल्कि इस बात में निहित होती है कि उसके शब्दों पर दुनिया कितना विश्वास करती है और जब विश्वास टूट जाता है, तब सबसे बड़ी महाशक्ति भी अपने प्रभाव का एक महत्वपूर्ण आधार खो देती है।
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