गुलाम सरवर: वो सूरज जो कभी अस्त नहीं होगा मोहम्मद राशिद अहमद संपादक संगम
बिहार के राजनीतिक और साहित्यिक इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो समय बीतने के साथ और भी प्रासंगिक और प्रतिष्ठित होते जा रहे हैं। इनमें एक अत्यंत प्रभावशाली नाम गुलाम सरवर साहब का है। आज 10 जनवरी है—उस 'लौह पुरुष' का जन्मदिवस, जिसने अपना पूरा जीवन उर्दू भाषा के अस्तित्व और समाज के पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
बिहार के बेगूसराय जिले के एक साधारण परिवार में जन्मे गुलाम सरवर साहब ने जब होश संभाला, तब उर्दू भाषा को उसके अपने ही घर में बेगाना बनाया जा रहा था। उन्होंने इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का संकल्प लिया। वे केवल एक शिक्षक या राजनेता नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसी लहर थे जिसने यथास्थिति के ठहराव को तोड़ दिया।
गुलाम सरवर साहब का सबसे बड़ा योगदान, जिसे बिहार कभी नहीं भूल सकता, वह है उर्दू को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिलाना। उन्होंने 'बिहार स्टेट उर्दू कन्वेंशन' के माध्यम से गांव-गांव का दौरा किया और लोगों को समझाया कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति और पहचान की संरक्षक होती है। 1980 के दशक में उनके इसी आंदोलन ने तत्कालीन सरकार को उर्दू के हक को स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया।
उनका समाचार पत्र "संगम" केवल खबरों का संग्रह नहीं, बल्कि मजलूमों (शोषितों) की आवाज था। अपनी बेबाक लेखनी के माध्यम से उन्होंने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी थी। सरवर साहब की पत्रकारिता में सच्चाई की वह धार थी कि बड़े-बड़े सत्ताधारी उनके कलम से खौफ खाते थे।
राजनीति में गुलाम सरवर साहब ईमानदारी और सिद्धांतों के पर्याय थे। उनके लिए राजनीति सत्ता का साधन नहीं, बल्कि सेवा का मिशन थी। जब वे बिहार विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) बने, तो उन्होंने सदन की कार्यवाही में वह अनुशासन और गरिमा स्थापित की, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल के दौरान वे एक मजबूत स्तंभ थे, लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। शिक्षा मंत्री और कृषि मंत्री के रूप में उनके निर्णय हमेशा जनहित को समर्पित रहे।
गुलाम सरवर साहब एक सम्मोहक वक्ता थे। जब वे मंच से बोलते थे, तो जनसमूह पर जादू सा छा जाता था। उनके शब्दों में धार भी थी और दर्द भी। वे अपने विरोधियों के लिए जितने कठोर थे, अपने कार्यकर्ताओं और लेखकों के लिए उतने ही दयालु और स्नेहिल थे। उन्होंने राजनीति को ड्राइंग रूम से निकालकर चौराहों और झोपड़ियों तक पहुँचाया।
आज जब उर्दू भाषा और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर चर्चा होती है, तो गुलाम सरवर साहब की कमी तीव्रता से महसूस होती है। उन्होंने सिखाया था कि:
> "अधिकार मांगे नहीं जाते बल्कि छीन लिए जाते हैं, और इसके लिए शिक्षा और एकता सबसे बड़े हथियार हैं।"
गुलाम सरवर साहब एक ऐसी मशाल थे जो खुद जलकर दूसरों को रास्ता दिखाती रही। वे आज हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं हैं, लेकिन बिहार के हर उस विद्यालय और कार्यालय में जहां उर्दू की पट्टिका लगी है, वहां गुलाम सरवर का नाम जीवित है। 10 जनवरी का यह दिन हमें याद दिलाता है कि यदि संकल्प दृढ़ हो और उद्देश्य नेक, तो एक अकेला व्यक्ति भी पूरे राज्य की तकदीर बदल सकता है। बिहार की मिट्टी हमेशा अपने इस महान सपूत पर गर्व करती रहेगी।
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