उपनिषदिक ज्ञान, अद्वैत दर्शन और आत्मबोध का सहज संगम है - अवधेश झा की नव कृति “ब्रह्म दर्शन”

उपनिषदिक ज्ञान, अद्वैत दर्शन और आत्मबोध का सहज संगम है - अवधेश झा की नव कृति “ब्रह्म दर्शन”

जितेन्द्र कुमार सिन्हा ,पटना 16 जनवरी ::

 दार्शनिक, आध्यात्मिक एवं वैदिक चिंतन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में लेखक अवधेश झा की नवीन कृति “ब्रह्म दर्शन” का हिन्दी में सफलतापूर्वक प्रकाशन संपन्न हुआ है। यह ग्रंथ उपनिषदिक ज्ञान, अद्वैत वेदान्त और आत्मबोध का एक सहज, गहन एवं अनुभवजन्य संगम प्रस्तुत करता है।

“ब्रह्म दर्शन” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक वैचारिक यात्रा है—
“अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” (ब्रह्मसूत्र 1.1.1) की भावना से प्रेरित, यह कृति जिज्ञासा से चिंतन तक और अंततः ब्रह्म-सत्य के साक्षात्कार तक ले जाने वाला दार्शनिक पथ प्रशस्त करती है।
इस अवसर पर लेखक अवधेश झा ने अपने वक्तव्य में श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक का संदर्भ देते हुए कहा—
“यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥” (गीता 6.22) अर्थात— जिस अवस्था को प्राप्त कर मनुष्य उससे श्रेष्ठ किसी अन्य लाभ की कल्पना नहीं करता और जिसमें स्थित होकर वह महान दुःख से भी विचलित नहीं होता, वही परम अवस्था उन्हें इस दर्शन-श्रृंखला के लेखन के दौरान अनुभूत हुई। यह आत्मोन्मुखी यात्रा जारी है।

लेखक ने बताया कि वे विगत कई वर्षों से साधना, गहन अध्ययन, योग, वेदान्त दर्शन एवं विविध आध्यात्मिक मार्गों का अनुसरण करते रहे, किंतु अंततः जिस मार्ग ने उन्हें ऐसी स्थिति प्रदान की—जिसके पश्चात किसी अन्य अवस्था की आवश्यकता शेष नहीं रहती—वह मार्ग ब्रह्म-विचार के माध्यम से “ब्रह्म दर्शन” है।

उनके अनुसार, ब्रह्म विचारों के द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति संभव है और यही इस दर्शन का मूल तत्त्व है।

अवधेश झा ने कहा कि ब्रह्म दर्शन उन्हें सहज, सुलभ और अनुभवसिद्ध प्रतीत हुआ। इसी कारण यह दर्शन उनके लिए केवल एक दार्शनिक अवधारणा न होकर “मेरा दर्शन” बन गया। शास्त्रीय दृष्टि से जहाँ भारतीय दर्शन परंपरा में षड्दर्शन (छह दर्शन) की मान्यता है, वहीं लेखक ने “ब्रह्म दर्शन” को सातवाँ दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह दर्शन-श्रृंखला दर्शन के सभी मूल मापदंडों—जैसे तत्त्व-जिज्ञासा, शास्त्र-आधारित विवेचन, साधना-पथ की स्पष्टता तथा जीवन-परिवर्तन के लक्ष्य—पर पूर्णतः खरी उतरती है। इसी कारण ब्रह्म दर्शन को एक स्वतंत्र दर्शन-ग्रंथ के रूप में स्वरूप स्थिति प्राप्ति के लिए प्रतिष्ठित किया है।

लेखक ने यह भी जानकारी दी कि “सातवाँ दर्शन” शीर्षक के अंतर्गत कई दार्शनिक कृतियाँ वर्तमान में प्रकाशनाधीन हैं, जिनमें “ब्रह्म दर्शन” इस श्रृंखला की प्रथम कृति है।
आध्यात्मिक साधकों, दर्शन के अध्येताओं तथा आत्मबोध की जिज्ञासा रखने वाले पाठकों के लिए “ब्रह्म दर्शन” निःसंदेह एक नई दृष्टि, नया संवाद और आत्मचिंतन का एक सशक्त माध्यम सिद्ध होगा।
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