दक्षिण की राजनीति में निर्णायक मोड़ होगी - तमिलनाडु, बीजेपी और द्रविड़ का भविष्य

दक्षिण की राजनीति में निर्णायक मोड़ होगी - तमिलनाडु, बीजेपी और द्रविड़ का भविष्य

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 03 जनवरी ::

भारतीय राजनीति में दक्षिण भारत लंबे समय तक एक अलग वैचारिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा है। जहां उत्तर और पश्चिम भारत में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और संगठनात्मक विस्तार के बल पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई है, वहीं दक्षिण भारत, विशेषकर केरल और तमिलनाडु, बीजेपी के लिए अब तक कठिन चुनौती बने रहे हैं। लेकिन बीते एक दशक में तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। कर्नाटक में सत्ता, तेलंगाना में बढ़ता वोट शेयर, केरल में संगठनात्मक विस्तार और अब तमिलनाडु में आक्रामक राजनीतिक प्रयोग, यह सभी संकेत देता हैं कि बीजेपी अब दक्षिण को केवल “विचारधारा का विरोधी क्षेत्र” मानकर छोड़ने के मूड में नहीं है। तमिलनाडु की राजनीति इस बदलाव का सबसे अहम रणक्षेत्र बनकर उभरी है।

तमिलनाडु की राजनीति को समझने के लिए द्रविड़ आंदोलन को समझना अनिवार्य है। द्रविड़ आंदोलन की वैचारिक नींव है ब्राह्मणवादी प्रभुत्व का विरोध, सामाजिक न्याय, आरक्षण, क्षेत्रीय अस्मिता, हिन्दी विरोध, धर्मनिरपेक्षता और नास्तिकता का आग्रह। इसी आंदोलन से जन्मी दो प्रमुख राजनीतिक शक्तियाँ रही है द्रविड़ मुनेत्र कषगम् (DMK) और अन्नाद्रमुक (AIADMK)।  इन दोनों दलों ने दशकों तक राज्य की सत्ता पर बारी-बारी से शासन किया है और राष्ट्रीय दलों, विशेषकर कांग्रेस एव बीजेपी, को हाशिये पर रखा है।

तमिलनाडु विधानसभा की कुल सीटें 234 हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में DMK नेतृत्व वाले गठबंधन को 133 सीटें और AIADMK गठबंधन को 66 सीटें तथा बीजेपी को मात्र 4 सीटें मिली थी। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि बीजेपी राज्य में अभी भी सीमित शक्ति है, लेकिन गठबंधन राजनीति के जरिए वह खुद को “तीसरे कोने” से निकालकर मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रही है।

बीजेपी की तमिलनाडु नीति को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला संगठनात्मक विस्तार- बीजेपी ने बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने पर जोर दिया है। RSS के जरिए सामाजिक संपर्क, युवाओं और पेशेवर वर्ग में पैठ, सोशल मीडिया और डिजिटल नैरेटिव। दूसरा सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों का प्रयोग- मंदिर राजनीति, द्रविड़ आंदोलन की नास्तिक परंपरा के विरुद्ध सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और तमिल शैव-सिद्धांत को हिंदुत्व से जोड़ने का प्रयास। और तीसरा स्थानीय नेतृत्व को राष्ट्रीय पहचान, यहीं से सी. पी. राधाकृष्णन का नाम सामने आता है।

तमिलनाडु के वरिष्ठ बीजेपी नेता सी. पी. राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद तक पहुंचाना केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह एक राजनीतिक संदेश था। इसके निहितार्थ बीजेपी यह दिखाना चाहती है कि तमिलनाडु के नेता भी राष्ट्रीय सत्ता संरचना में स्थान पा सकती हैं। द्रविड़ दलों के “उत्तर भारत केंद्रित सत्ता” वाले आरोपों को चुनौती और तमिल समाज में बीजेपी के प्रति स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास। यह कदम राज्य में बीजेपी की दीर्घकालिक योजना का हिस्सा माना जा रहा है।

बीजेपी और AIADMK का गठबंधन नया नहीं है, लेकिन हर बार इसके स्वरूप और मजबूती में बदलाव आता रहा है। AIADMK की स्थिति रही है जयललिता के बाद नेतृत्व संकट, संगठनात्मक बिखराव और करिश्माई चेहरे की कमी। बीजेपी की भूमिका है राष्ट्रीय सत्ता का लाभ, संसाधन और प्रचार मशीनरी और वैचारिक स्पष्टता (कम से कम अपने समर्थकों के लिए)। यह गठबंधन DMK विरोध के साझा एजेंडे पर टिका है, न कि वैचारिक साम्य पर।

मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन के नेतृत्व में DMK सरकार ने सामाजिक न्याय, केंद्र बनाम राज्य, हिन्दी थोपने का विरोध और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी है। बीजेपी के खिलाफ रणनीति है हिंदुत्व को “उत्तर भारतीय एजेंडा” बताना, सनातन धर्म पर तीखे बयान और केंद्र सरकार पर संघीय ढांचे को कमजोर करने का आरोप। यदि DMK दोबारा सत्ता में आती है, तो यह टकराव और तेज होने की संभावना है।

तमिलनाडु आज केवल चुनावी मुकाबले का नहीं है, बल्कि वैचारिक संघर्ष का केंद्र बन चुका है। बीजेपी यदि केरल और तमिलनाडु में 15-20% स्थायी वोट शेयर और 20–30 सीटों की उपस्थिति बनाने में सफल होती है, तो यह दक्षिण भारत में राजनीतिक गेमचेंजर साबित हो सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव बनेगा राज्यसभा में ताकत, राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनाव में मजबूती और “दक्षिण विरोधी पार्टी” की छवि टूटना। यदि बीजेपी सफल होती है तो संभावित परिदृश्य होगा DMK की वैचारिक एकाधिकार टूटेगी, तमिलनाडु में त्रिकोणीय राजनीति उभरेगी, कांग्रेस और वाम दल और कमजोर होंगे, दक्षिण भारत राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आएगा।

यदि DMK मोर्चा जीतता है तो हिंदुत्व विरोधी बयानबाजी और तीखी होगी। दक्षिण भारत ‘संघीय प्रतिरोध’ का केंद्र बनेगा। 2029 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष को वैचारिक ऊर्जा मिलेगी और बीजेपी को दक्षिण में रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।

तमिलनाडु की राजनीति अब सिर्फ 234 सीटों की विधानसभा तक सीमित नहीं है। यह बीजेपी के लिए दक्षिण का द्वार। DMK के लिए वैचारिक अस्तित्व की लड़ाई और भारत के लिए संघीय संरचना की परीक्षा होगी। यदि बीजेपी यहां मजबूत होती है, तो वह यह कहने की स्थिति में होगी कि दक्षिण अब अपराजेय नहीं रहा और यदि DMK जीतती है, तो यह संदेश जाएगा कि द्रविड़ राजनीति अभी जीवित है और आक्रामक भी। आने वाले वर्षों में तमिलनाडु तय करेगा कि भारत की राजनीति उत्तर-दक्षिण की खाई पाटेगी या और गहरी होगी।
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