रक्तचाप के प्रति लापरवाही मौत को आमंत्रण - डॉ विजय आचारी

रक्तचाप के प्रति लापरवाही मौत को आमंत्रण - डॉ विजय आचारी

मानव की नित्यप्रति बढ़ती महत्त्वकांक्षाओं के कारण रक्तचाप जैसे रोग का जन्म हुआ है।आज यह बीमारी कई अन्य बीमारियों को पनपने में सहायता कर रहा है। उदाहरण स्वरूप प्रत्येक मधुमेह के रोगी को उच्च रक्तचाप होता है। हृदय की बीमारी, गुर्दे की बीमारी एवं दिमाग की बीमारी वाले रोगी भी रक्तचाप में ग्रसित होते हैं। रक्तचाप के कारण ही बहुत हद तक ये बीमारियां उत्पन्न होती हैं ।आज यह बीमारी औसतन सभी घरों में किसी न किसी को है।

लोग आज भौतिकतावादी हो गए हैं और भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिए कुछ भी परेशानी झेलने को तैयार हैं। सीमित आय में असीमित सुख-सुविधाओं को अर्जित करने के चक्कर में मानसिक तनाव से ग्रसित हो रक्तचाप के रोगी बन जाते हैं। रक्तचाप के रोगियों की संख्या में आज बेतहाशा वृद्धि हो रही है।

रक्तचाप के रोगियों को रक्तचाप के संबंध में कुछ विशेष जानकारियां उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हमारे संवाददाता सुरेन्द्र कुमार रंजन ने राजेन्द्र नगर ,रोड नंबर 10 में स्थित डायबेटिक क्लिनिक के संस्थापक डा. विजय आचारी से मुलाकात कर बातचीत की। उस वार्तालाप के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं :-

रक्तचाप  क्या है?

 हमारे शरीर में रक्त का संचालन प्रेशर (दबाव) के माध्यम से होता है। हृदय से पम्प होकर रक्त एक निश्चित दबाव सीमा के अंतर्गत सारे शरीर में परिसंचरित होता है। चिकित्सकों की राय में इसकी सीमा सामान्यतः 110- 140 mmHg/ 70- 90 mmHg मानी गई है। ऊपरी दबाव सीमा को सिस्टोलिक एवं निचली दबाव सीमा को डायस्टोलिक कहा जाता है। साधारण भाषा में रक्त का शरीर केविभिन्न भागों में नियत दबाव के साथ संचालन ही 'रक्तचाप' है।

रक्तचाप के विभिन्न प्रकार :-

चिकित्सकों ने रक्तचाप को दो भागों में विभक्त किया है- उच्च रक्तचाप एवं निम्न रक्तचाप। मगर कुछ चिकित्सकों की नजर में निम्न रक्त चाप कोई बीमारी नहीं है बल्कि कुछ अन्य बीमारियों के कारण यह उत्पन्न होता है। यदि उस बीमारी का उपयुक्त इलाज किया जाय तो वह स्वतः ठीक हो जाता है। उच्च रक्तचाप को भी दो भागों में विभक्त किया गया है- सिस्टोलिक (110- 140 mmHg) एवं डायस्टोलिक (70- 90 mmHg) । हृदय के संकुचन (धड़कन) के दौरान जो दबाव होता है उसे सिस्टोलिक और हृदय के आराम करने की स्थिति में जो दबाव होता है उसे डायस्टोलिक कहते हैं।

उच्च रक्तचाप के सामान्य लक्षण :-

उच्च रक्तचाप के सामान्य लक्षण कुछ लोगों में ही देखने को मिलता है, जबकि अधिकांश लोगों में अन्य बीमारियों के जांच के दौरान इसका पता चलता है। यदि उच्च रक्तचाप अधिक बढ़ जाता है तो रोगी के सीने में दर्द होने लगता है, सिरदर्द होता है, चक्कर आता है, थकान महसूस होता है एवं कभी-कभी तो बेहोशी की हालत भी हो जाती है। अत्यधिक वृद्धि होने पर ही रोगी बेहोशी की हालत में चला जाता है।

उच्च रक्तचाप के लिए  कौन-कौन से कारण उत्तरदायी :-

उच्च रक्तचाप के लिए कौन सा कारण मुख्य रूप से उत्तरदायी है, इसका पता अभी तक नहीं चल पाया है। इसके लिए अभी शोध कार्य चल रहा हैं लेकिन सामान्य रूप से जो इसके कारण पाए गए
हैं उनमें खाने पीने में बदपरहेजी, अधिक मोटापा, खाने में अत्यधिक नमक का प्रयोग, तली हुई वस्तुओं का अत्यधिक प्रयोग, अनियमित व्यायाम, पैतृकगुण आदि प्रमुख हैं।

उच्च रक्तचाप के कारण शरीर के कौन-कौन से अंग प्रभावित :-

 ऐसे तो शरीर का कोई भी अंग इससे प्रभावित हो सकता है लेकिन मुख्य रूप से हृदय, गुर्दा एवं मस्तिष्क को इससे नुकसान पहुंचता है।

उच्च रक्तचाप के कारण उत्पन्न होने वाली बीमारियां :-

उच्च रक्तचाप जब अपनी सीमा से काफी बढ़ जाता है तब मुख्य रूप से दिल, दिमाग एवं गुर्दा को क्षति पहुंचाता है। इससे उत्पन्न होने वाली बीमारियों में दिल का दौरा, हार्ट फेल, हृदय गति में व्यवधान, गुर्दा में खराबी, पैर के रक्त परिसंचरन में व्यवधान, लकवा (पक्षाघात) आदि प्रमुख हैं।

क्या यह वंशानुगत (पैतृक) बीमारी है?

पूर्णरूप से इसे वंशानुगत बीमारी की दर्जा हम नहीं दे सकते। लेकिन यह देखा गया है कि जिसके परिवार में दो-तीन सदस्यों को यह बीमारी हो जाती है तो उसके अगली पीढ़ी के सदस्यों को भी यह बीमारी हो जाती है। इसलिए कुछ हद तक इसे वंशानुगत बीमारी की संज्ञा हम दे सकते हैं।

कुछ लोगों का मत है कि इस रोग से जान भी जा सकती है, इस संबंध में आपका क्या मत है?

यह बात सत्य है कि रक्तचाप अत्यधिक बढ़ जाने पर जान जाने का खतरा बना रहता है। कुछ केसों में लोग मर भी जाते हैं, क्योंकि इससे शरीर के तीन प्रमुख अंग मुख्य रूप से प्रभावित होते है। वे अंग हैं - हृदय, मस्तिष्क एवं गुर्दा। इसमें से कोई भी एक खराब हो जाता है तो आदमी मृतप्रायः हो जाता है।  कभी-कभी तो रोगी की जान भी चली जाती है।

प्रश्न- किस प्रकार का रक्तचाप ज्यादा खतरनाक होता है?
             
सिस्टोलिक एवं डायस्टोलिक दोनों प्रकार के रक्तचाप मानव के लिए खतरनाक होते हैं। इन दोनों का सीमा से अधिक बढ़ना जानलेवा होता है।

क्या इस रोग से ग्रसित रोगी पूर्णतः ठीक हो सकता है? 

जिसके रक्तचाप में मामूली वृद्धि होती है, उसे परहेज एवं नियमित व्यायाम के द्वारा काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। अधिकांश रोगियों को परहेज और व्यायाम के साथ - साथ नियमित दवा भी लेनी पड़ती है।

इस रोग से ग्रसित रोगियों का उपचार :-

इस रोग से ग्रसित रोगियों का उपचार विभिन्न तरीकों से किया जाता है जो इस प्रकार है :-

(क) नियमित जीवन (तनावमुक्त जीवन)- उच्च रक्तचाप से पीड़ित रोगियों को तनाव से दूर रहना चाहिए।

(ख) परहेज - ऐसे रोगियों को संतुलित आहार लेना चाहिए। अत्यधिक नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। तली हुई वस्तुओं से परहेज करना चाहिए। प्रायः प्रत्येक मधुमेह के रोगी उच्च रक्तचाप से पीड़ित होते हैं इसलिए मधुमेह में जो-जो परहेज किया जाता है वही परहेज ऐसे रोगियों को भी करना चाहिए।

(ग) नियमित व्यायाम - ऐसे रोगियों को नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए। चिकित्सकों द्वारा बताए गए व्यायामों को ही करना चाहिए।

(घ) योग साधना - कुछ चिकित्सकों का मत है कि योग साधना से भी इसमें लाभ होता है।

(ड) मोटापा घटाना - मोटे रोगियों को मोटापा घटाने की कोशिश करनी चाहिए।

(च) दवा - उपयुक्त बताए गए उपचारों के अतिरिक्त दवा का सेवन भी जरूरी है। रक्तचाप को घटाने के लिए कई प्रकार की दवाओं का सेवन रोगियों को करना पड़ता है। चिकित्सकों द्वारा बताए दवा का ही सेवन करें।

(छ) नियमित जांच - उच्च रक्तचाप से ग्रसित रोगियों को नियमित रक्तचाप की जांच करवानी चाहिए।
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