फाइलेरिया (हाथीपांव) और कालाजार सहित लगभग 21 रोगों के प्रति जागरूकता का संदेश देता है विश्व एनटीडी दिवस
प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को पूरी दुनिया में मनाया जाता है विश्व एनटीडी दिवस
• 10 फरवरी से 27 फरवरी 2026 तक बिहार के 34 जिलों के 395 प्रखंडों में एमडीए कार्यक्रम का संचालन
• लगभग 11 करोड़ लाभार्थियों को फाइलेरिया-रोधी दवाएं खिलाने का लक्ष्य
पटना, 31 जनवरी 2026 : प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को पूरे विश्व में विश्व एनटीडी दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज़ (एनटीडी) के नियंत्रण एवं उन्मूलन के लिए वैश्विक स्तर पर जन-आंदोलन के रूप में प्रतिबद्धता को सशक्त बनाना है। इसी क्रम में राज्य में भी विश्व एनटीडी दिवस मनाया गया तथा लोगों को नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज़ के प्रति जागरूक किया गया।
अपर निदेशक एवं राज्य फाइलेरिया कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ. श्यामा राय ने बताया कि एनटीडी से लोगों को सुरक्षित रखने हेतु राज्य सरकार द्वारा निरंतर सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि फाइलेरिया अथवा हाथीपांव एक गंभीर रोग है, जो संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलता है। विश्व के 72 देश फाइलेरिया से प्रभावित हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। वैश्विक स्तर पर फाइलेरिया से पीड़ित कुल रोगियों में से लगभग 40 प्रतिशत रोगी भारत में हैं।
उन्होंने बताया कि राज्य में फाइलेरिया जैसे एनटीडी के उन्मूलन के लिए रोग प्रभावित क्षेत्रों में सुनियोजित रणनीति के तहत सर्वजन दवा सेवन (मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन – एमडीए) कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में आगामी 10 फरवरी से 27 फरवरी 2026 तक राज्य के 34 जिलों के 395 प्रखंडों में एमडीए कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य अधिकतम आबादी को फाइलेरिया-रोधी दवाएं खिलाकर रोग के संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ना है। फाइलेरिया प्रभावित जिलों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा लाभार्थियों को दवाएं उनके सामने खिलाई जाएंगी।
राज्य में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के स्टेट एनटीडी कोऑर्डिनेटर डॉ. राजेश पाण्डेय हैं | विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज़ मुख्यतः उष्णकटिबंधीय एवं उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में निवास करने वाले विश्व के एक अरब से अधिक लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। ये रोग विशेष रूप से गरीब और कमजोर वर्गों को शारीरिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से अत्यधिक प्रभावित करते हैं।
उन्होंने कहा कि यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एनटीडी के नियंत्रण एवं उन्मूलन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। एनटीडी के अंतर्गत लिम्फैटिक फाइलेरिया (हाथीपांव), विसेरल लीशमैनियासिस (कालाजार), कुष्ठ रोग (लेप्रोसी), डेंगू, चिकुनगुनिया, सर्पदंश, रेबीज़ सहित लगभग 21 रोग शामिल हैं। इन रोगों के कारण अब तक हजारों ऐसी मौतें हो चुकी हैं, जिन्हें रोका जा सकता था। एनटीडी से प्रभावित लोगों को असहनीय पीड़ा, विकृति, दिव्यांगता तथा सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में ये रोग व्यक्ति को शारीरिक रूप से अक्षम बना देते हैं, जिससे वह अपनी आजीविका अर्जित करने में असमर्थ हो जाता है और आर्थिक एवं सामाजिक रूप से गंभीर संकट का सामना करता है। सूत्र बताते हैं कि नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज़ के नियंत्रण एवं उन्मूलन के लिए वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश करने का यह एक महत्वपूर्ण अवसर है। एनटीडी में निवेश से न केवल स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार होता है, बल्कि समग्र अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है। बिहार में कालाजार, लिम्फैटिक फाइलेरिया, कुष्ठ रोग, कृमिरोग एवं डेंगू प्रमुख नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज़ हैं।
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