स्वाभिमान और अहंकार के बीच होती है महीन रेखा

स्वाभिमान और अहंकार के बीच होती है महीन रेखा

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 28 अक्टूबर ::

स्वाभिमान और अहंकार के बीच एक ऐसी महीन रेखा होती है, जिसे देखना, समझना, संभालना और उसका सही आकलन करना हर किसी के वश की बात नहीं है। स्वाभिमान मनुष्य की गरिमा का प्रतीक है, जबकि अहंकार उसी गरिमा के अतिरेक से पैदा होने वाला वह भ्रम है, जो व्यक्ति को अपनी वास्तविक सीमाओं से अनजान कर देता है। स्वाभिमान हमें सिर उठाकर जीना सिखाता है, लेकिन अहंकार दूसरों को नीचा दिखाकर स्वयं को ऊंचा साबित करने की भूल में डाल देता है। समस्या तब शुरू होती है, जब हालात पर जज्बात अतिक्रमण करने लगते हैं। व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा बचाने के नाम पर विवेक से समझौता करने लगता है। उसे लगता है कि पीछे हटना कमजोरी है, समझौता करना पराजय है और किसी दूसरे की बात मान लेना उसके व्यक्तित्व का अपमान है। यहीं से अहंकार का बीज अंकुरित होता है। धीरे-धीरे यही बीज एक विशाल वृक्ष बन जाता है, जिसकी छाया में व्यक्ति को अपनी गलतियां भी सही दिखाई देने लगती है। इसका परिणाम अक्सर वही होता है, जिसे लोकभाषा में कहा जाता है कि अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना।

राजनीति में यह कहावत और भी प्रासंगिक हो जाती है। यहां केवल लोकप्रियता, जनाधार या पद ही किसी व्यक्ति की सफलता की गारंटी नहीं होते हैं। राजनीति में समय की पहचान, परिस्थितियों का आकलन, विरोधियों की ताकत को समझना और सही अवसर पर सही निर्णय लेना भी उतना ही आवश्यक है। जो व्यक्ति इन पहलुओं की अनदेखी करता है, वह अपनी ही बनाई हुई ऊंचाई से नीचे गिरने लगता है।

भारतीय दर्शन का महावाक्य 'अहम् ब्रह्मास्मि' आत्मा और ब्रह्म की एकता के गहन आध्यात्मिक बोध से जुड़ा है। लेकिन जब कोई व्यक्ति इस भाव को आत्मज्ञान के बजाय अपनी राजनीतिक सर्वशक्तिमत्ता का प्रमाण मानने लगता है, तब वह दर्शन नहीं, आत्ममुग्धता का शिकार होता है। सत्ता का सबसे बड़ा संकट यही है कि वह व्यक्ति को धीरे-धीरे यह विश्वास दिलाने लगती है कि उसके बिना व्यवस्था नहीं चल सकती। उसके निर्णय ही अंतिम हैं, उसकी इच्छा ही जनादेश है और उसकी उपेक्षा करने वाला हर व्यक्ति राजनीतिक रूप से समाप्त हो जाएगा। लेकिन इतिहास बार-बार साबित करता है कि सत्ता किसी की स्थायी संपत्ति नहीं है। कुर्सी पर बैठा व्यक्ति चाहे जितना शक्तिशाली हो, समय उससे बड़ा होता है और जनता का निर्णय किसी भी राजनीतिक समीकरण को बदल सकता है।

आसमान की ओर देखकर अपनी ऊंचाई का अनुमान लगाने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि आसमान के ऊपर भी आसमान होता है। राजनीतिक जीवन में भी कोई सीमा अंतिम नहीं होती, कोई विजय स्थायी नहीं होती और कोई पराजय हमेशा के लिए नहीं होती है। जो नेता इस सत्य को समझ लेते हैं, वे परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालते हैं। जो इसे नकारते हैं, वे अपने ही भ्रम के कैदी बन जाते हैं।

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का व्यक्तित्व इसी संदर्भ में चर्चा का विषय रहा है। उनकी राजनीतिक यात्रा को केवल मुख्यमंत्री पद, गठबंधन परिवर्तन या चुनावी परिणामों के आधार पर नहीं समझा जा सकता है। इसे समझने के लिए बिहार की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण, विकास की आकांक्षाओं, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और गठबंधन की बदलती परिस्थितियों को भी देखना होगा।

नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी उन्हें विकास और सुशासन की राजनीति के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो कभी उनके गठबंधन संबंधी निर्णयों को लेकर सवाल उठे। कभी उनकी राजनीतिक ताकत पर चर्चा हुई, तो कभी उनके भविष्य को लेकर अटकलें लगाई गई। इसके बावजूद वे बिहार की राजनीति के केंद्रीय पात्र बने रहे। यही उनकी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण पक्ष है।

किसी नेता की वास्तविक क्षमता का आकलन केवल उसके समर्थकों के उत्साह या विरोधियों की आलोचना से नहीं किया जा सकता है। यह देखना पड़ता है कि वह बदलते राजनीतिक परिवेश में अपनी प्रासंगिकता कितनी देर तक बनाए रखता है, उसके निर्णयों का चुनावी और प्रशासनिक प्रभाव क्या होता है और वह अपने पक्ष में उपलब्ध राजनीतिक संभावनाओं का उपयोग किस प्रकार करता है।

नीतीश कुमार की राजनीति से सहमति या असहमति हो सकती है। उनके निर्णयों की आलोचना भी की जा सकती है। लोकतंत्र में यह नागरिकों का अधिकार है। लेकिन उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और बिहार की सत्ता में उनकी भूमिका को केवल व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के चश्मे से देखना राजनीतिक विश्लेषण को अधूरा बना देगा। राजनीति में किसी व्यक्ति का टिके रहना केवल संयोग नहीं होता है। उसके पीछे परिस्थितियों की समझ, संगठनात्मक समर्थन, सामाजिक समीकरण, गठबंधन की गणित और समय के साथ बदलने की क्षमता जैसे अनेक कारक काम करते हैं।

राजनीति में ऐसे अनेक चेहरे उभरते हैं, जिनकी चमक एक समय में ध्रुवतारे जैसी दिखाई देती है। उनके भाषणों पर तालियां बजती हैं, उनके निर्णयों को अंतिम सत्य माना जाता है और उनके आसपास समर्थकों की ऐसी भीड़ जुटती है कि उन्हें अपना भविष्य अजेय दिखाई देने लगता है। लेकिन समय का चक्र घूमता है। कभी जनता की आंखों का तारा रहा नेता धीरे-धीरे राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो जाता है। कभी सत्ता के गलियारों में जिसकी आवाज सबसे ऊंची सुनाई देती थी, वही एक दिन अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए संघर्ष करता नजर आता है। कुछ लोग संगठन खो देते हैं, कुछ जनाधार, कुछ सहयोगियों का विश्वास और कुछ अपनी निर्णय क्षमता पर नियंत्रण। इसलिए राजनीति में वर्तमान सफलता को भविष्य की स्थायी गारंटी मान लेना सबसे बड़ी भूल है।

यह भी सच है कि प्रत्येक राजनीतिक गिरावट का कारण अहंकार ही नहीं होता है। बदलती सामाजिक आकांक्षाएं, आर्थिक परिस्थितियां, नेतृत्व की सीमाएं, संगठन की कमजोरी और जनता की नाराजगी भी किसी नेता के पतन का कारण बन सकती हैं। लेकिन जब अहंकार इन समस्याओं को स्वीकार करने से रोक देता है, तब संकट और गहरा हो जाता है। जो नेता आलोचना को शत्रुता समझने लगते हैं, वे समय रहते अपनी कमियों को पहचान नहीं पाते हैं। जो सहयोगियों की असहमति को अपमान मान लेते हैं, वे धीरे-धीरे अपने आसपास ऐसे लोगों को जमा कर लेते हैं, जो केवल उनकी प्रशंसा करते हैं। अंततः वास्तविकता और उनके विश्वास के बीच दूरी बढ़ती जाती है। राजनीति में यही दूरी कई बार पतन की शुरुआत बन जाती है।

स्वाभिमान व्यक्ति को अपनी गरिमा के साथ खड़े रहने की शक्ति देता है। वह अन्याय के सामने झुकने से रोकता है और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता बनाए रखने में सहायता करता है। लेकिन स्वाभिमान का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपनी प्रत्येक बात को सही माने और हर परिस्थिति में अपने निर्णय पर अड़ा रहे। राजनीति में सिद्धांतों की रक्षा और जिद के बीच अंतर समझना बेहद जरूरी है। मान लीजिए, कोई राजनीतिक नेता अपने सहयोगी से असहमत है। मतभेद स्वाभाविक है। यदि वह बातचीत, संवाद और संभावित समाधान का रास्ता चुनता है, तो यह उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता है। लेकिन यदि वह केवल इसलिए संबंध तोड़ लेता है कि सामने वाले ने उसकी बात नहीं मानी, तो उसका स्वाभिमान धीरे-धीरे अहंकार में बदल सकता है।

इसी प्रकार, किसी पद या प्रतिष्ठा को बचाने के लिए हर कीमत पर संघर्ष करना भी हमेशा बुद्धिमानी नहीं होती है। कभी-कभी पद छोड़ना सिद्धांतों की रक्षा हो सकता है और कभी पद पर बने रहना व्यापक जनहित की दृष्टि से आवश्यक हो सकता है। निर्णय का मूल्यांकन उसके उद्देश्य, परिस्थितियों और परिणामों के आधार पर होना चाहिए। राजनीति में सबसे कठिन काम अपनी गलती स्वीकार करना है। इसके लिए आत्मविश्वास के साथ-साथ आत्ममंथन की क्षमता भी चाहिए। जो व्यक्ति अपनी गलती मान सकता है, वह स्वयं को सुधार सकता है। जो व्यक्ति गलती मानने को अपनी प्रतिष्ठा का संकट समझता है, वह सुधार के रास्ते बंद कर लेता है। अहंकार की सबसे खतरनाक विशेषता यही है कि वह व्यक्ति को यह महसूस ही नहीं होने देता कि वह गलत दिशा में जा रहा है।

नीतीश कुमार की राजनीति पर चर्चा करते समय बिहार को केंद्र में रखना आवश्यक है। बिहार की राजनीति केवल व्यक्तियों की महत्वाकांक्षाओं से संचालित नहीं होती है। यहां सामाजिक न्याय, जातीय समीकरण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, पलायन, कानून-व्यवस्था और विकास की अपेक्षाएं चुनावी व्यवहार को प्रभावित करती है।

किसी नेता की राजनीतिक शक्ति का आकलन इस बात से भी होता है कि वह इन विविध अपेक्षाओं के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करता है। गठबंधन की राजनीति में यह चुनौती और कठिन हो जाती है, क्योंकि वहां सहयोगियों की आकांक्षाओं, संगठनात्मक हितों और मतदाताओं की अपेक्षाओं के बीच सामंजस्य बैठाना पड़ता है।

नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। उनके समर्थक जहां उनके प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक स्थिरता को महत्व देते हैं, वहीं आलोचक उनके निर्णयों, नीतियों और गठबंधन संबंधी रणनीतियों पर प्रश्न उठाते हैं। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनना लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। लेकिन जो राजनीतिक विश्लेषक यह मानकर चलते हैं कि उनकी इच्छा या आकलन मात्र से बिहार की राजनीति की दिशा तय हो जाएगी, वे जनादेश, सामाजिक परिस्थितियों और राजनीतिक रणनीति की जटिलता को कम करके आंकते हैं। कोई भी नेता केवल इसलिए सफल नहीं होता कि वह दूसरों से अधिक चतुर है। उसकी सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह अपने समय की मांग को कितनी अच्छी तरह समझता है। इसी तरह कोई नेता केवल इसलिए विफल नहीं होता कि उसके विरोधी शक्तिशाली हैं। कई बार अपनी गलतियों का बोझ ही उसकी राजनीतिक शक्ति को कमजोर कर देता है। नीतीश कुमार की राजनीति का मूल्यांकन भी इसी व्यापक दृष्टिकोण से होना चाहिए।

राजनीति भावनाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती है। जनभावनाएं, सम्मान, अपमान, निष्ठा और विश्वास राजनीतिक संबंधों को प्रभावित करते हैं। लेकिन केवल भावनाओं के आधार पर लिए गए निर्णय अक्सर दूरगामी परिणामों का सही अनुमान नहीं लगा पाते हैं। एक अनुभवी राजनीतिज्ञ जानता है कि हर विवाद का तत्काल जवाब देना जरूरी नहीं होता है, हर चुनौती को सार्वजनिक टकराव में बदलना बुद्धिमानी नहीं होता है और हर असहमति का समाधान शक्ति प्रदर्शन से नहीं निकलता है। कभी मौन भी रणनीति होता है। कभी प्रतीक्षा भी निर्णय होती है। कभी पीछे हटना आगे बढ़ने की तैयारी होती है। और कभी अपनी बात पर अडिग रहना ही राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा का एकमात्र रास्ता होता है। इन परिस्थितियों के बीच सही निर्णय वही कर सकता है, जो अपने जज्बात को विवेक पर हावी न होने दे।

राजनीति में समय का इंतजार करने का अर्थ निष्क्रिय रहना नहीं है। इसका अर्थ है परिस्थितियों को समझना, विकल्पों का आकलन करना और ऐसा कदम उठाना, जिसके परिणामों को संभालने की क्षमता भी हो। यही वह बिंदु है, जहां राजनीतिक अनुभव और व्यक्तिगत अहंकार के बीच अंतर स्पष्ट होता है। अनुभव व्यक्ति को धैर्य सिखाता है, जबकि अहंकार उसे तत्काल विजय की लालसा में धकेलता है।

समय सबसे बड़ा निर्णायक है। वह किसी के लिए नहीं रुकता। न सत्ता के लिए, न प्रतिष्ठा के लिए और न ही किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षा के लिए। आज जो अवसर है, कल वह चुनौती बन सकता है। आज जो सहयोगी है, कल उसका राजनीतिक हित बदल सकता है। आज जो जनसमर्थन मजबूत दिखाई देता है, कल जनता के प्रश्नों के सामने उसकी परीक्षा हो सकती है। इसलिए राजनीति में समय को चुनौती देने के बजाय उसकी चाल को पहचानना आवश्यक है।

जो नेता समय की बदलती मांग को समझते हैं, वे अपनी रणनीति में आवश्यक बदलाव करते हैं। वे जानते हैं कि स्थायी सिद्धांतों और बदलती परिस्थितियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है। वे यह भी समझते हैं कि हर समझौता अवसरवाद नहीं होता और हर टकराव सिद्धांतों की लड़ाई नहीं होता। इसी तरह हर राजनीतिक बदलाव को पराजय और हर पद पर बने रहने को विजय नहीं कहा जा सकता। राजनीति की सफलता का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे जनता को क्या मिला, लोकतांत्रिक संस्थाएं कितनी मजबूत हुईं और शासन व्यवस्था कितनी जवाबदेह बनी। किसी नेता का राजनीतिक कौशल प्रशंसनीय हो सकता है, लेकिन उस कौशल की अंतिम कसौटी जनहित ही होना चाहिए। लोकतंत्र में कोई नेता जनता से ऊपर नहीं है और कोई राजनीतिक रणनीति जनादेश से बड़ी नहीं हो सकती।

राजनीति में सबसे बड़ी भूल तब होती है, जब व्यक्ति अपने विरोधियों को कम और स्वयं को अधिक समझने लगता है। वह मान बैठता है कि दूसरे उसकी रणनीति नहीं समझ सकते, कोई उसका विकल्प नहीं बन सकता और उसकी राजनीतिक यात्रा का अंत उसके अपने निर्णय से नहीं, बल्कि दूसरों की साजिश से ही संभव है। ऐसी सोच आत्ममंथन की क्षमता को नष्ट कर देती है।

राजनीति में विरोधी की ताकत पहचानना जितना आवश्यक है, अपनी सीमाओं को पहचानना भी उतना ही जरूरी है। सहयोगियों की उपयोगिता समझना जितना महत्वपूर्ण है, उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान का सम्मान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जनता के समर्थन पर भरोसा करना उचित है, लेकिन उस समर्थन को स्थायी और निर्विवाद मान लेना उचित नहीं। जो व्यक्ति इन सत्यों को नजरअंदाज करता है, वह अनजाने में अपनी ही राजनीतिक संभावनाओं को कमजोर कर सकता है। उसकी सबसे बड़ी लड़ाई बाहर के विरोधियों से नहीं, बल्कि अपने भीतर बैठे उस अहंकार से होती है, जो उसे वास्तविकता देखने नहीं देता।,यह चेतावनी किसी एक नेता के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए है, जो सार्वजनिक जीवन में पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव के शिखर तक पहुंचते हैं।

स्वाभिमान मनुष्य की शक्ति है, लेकिन अहंकार उसकी कमजोरी। स्वाभिमान हमें अपनी गरिमा की रक्षा करना सिखाता है, जबकि अहंकार हमें यह भ्रम देता है कि हमारी गरिमा दूसरों को झुकाने से ही सुरक्षित रह सकती है। स्वाभिमान संवाद का रास्ता बंद नहीं करता, जबकि अहंकार हर असहमति को चुनौती बना देता है। राजनीति में इस अंतर को समझना और भी आवश्यक है। यहां केवल ऊंचा उठना पर्याप्त नहीं, ऊंचाई पर पहुंचकर संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। केवल विरोधियों को परास्त करना सफलता नहीं, स्वयं की गलतियों को पहचानना भी सफलता का हिस्सा है। केवल सत्ता हासिल करना उपलब्धि नहीं, उसका उपयोग जनहित में करना ही उसकी सार्थकता है।

नीतीश कुमार की लंबी राजनीतिक यात्रा से सहमति-असहमति के अनेक बिंदु निकाले जा सकते हैं। लेकिन इतना अवश्य समझा जा सकता है कि बिहार की राजनीति को किसी एक व्यक्ति के अहंकार, किसी दूसरे की महत्वाकांक्षा या किसी तीसरे की भविष्यवाणी के सहारे पूरी तरह नहीं समझा जा सकता है। इसके लिए समय, समाज, संगठन, गठबंधन और जनभावनाओं की भूमिका को समझना होगा।

राजनीति में कोई भी व्यक्ति अपरिहार्य नहीं होता है। इतिहास में कोई स्थायी विजेता नहीं होता है और लोकतंत्र में जनता से बड़ा कोई निर्णायक नहीं होता है। इसलिए जो नेता अपने स्वाभिमान को विवेक से जोड़ते हैं, वे परिस्थितियों का सामना बेहतर ढंग से कर पाते हैं। जो स्वाभिमान की आड़ में अहंकार को पालते हैं, वे कई बार अपनी ही बनाई हुई दीवारों में कैद हो जाते हैं। अंततः राजनीति का मूल मंत्र यही है- स्वाभिमान को जीवित रखिए, अहंकार को नियंत्रित कीजिए, समय की नब्ज पहचानिए और जनता के विश्वास को सर्वोपरि मानिए। क्योंकि सत्ता का शिखर कितना भी ऊंचा क्यों न हो, समय उससे ऊंचा है। और जो समय की चाल को नहीं समझता, उसके पास अंततः अपनी उपलब्धियों को याद करने के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रह जाता है।
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