भारत 20 और देशों में खोलेगा डिफेंस विंग
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 16 अक्टूबर ::
भारत की विदेश और रक्षा नीति अब केवल अपनी सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गई है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है, जो न केवल अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है, बल्कि मित्र देशों की सुरक्षा आवश्यकताओं में भी महत्वपूर्ण भागीदार बन सकता है। इसी दिशा में भारत ने अगले पांच वर्षों में 20 और देशों में भारतीय दूतावासों के साथ डिफेंस विंग स्थापित करने की योजना बनाई है। इन रक्षा शाखाओं में डिफेंस अटैची और रक्षा सलाहकारों की नियुक्ति की जाएगी। अभी 52 देशों में स्थित भारतीय दूतावासों में रक्षा शाखाएं काम कर रही हैं। आने वाले समय में दो चरणों में 20 और देशों को इस नेटवर्क में शामिल करने का निर्णय लिया गया है। यह पहल भारत के रक्षा कूटनीति अभियान को नई गति देने के साथ-साथ रक्षा निर्यात, सैन्य सहयोग और रणनीतिक साझेदारी के विस्तार का माध्यम बन सकती है।
किसी देश में भारतीय दूतावास केवल राजनीतिक और राजनयिक संवाद का केंद्र नहीं होता। आज के दौर में विदेश नीति के साथ रक्षा, तकनीक, सुरक्षा, समुद्री सहयोग, आतंकवाद-रोधी अभियान, सैन्य प्रशिक्षण और रक्षा उद्योग भी किसी देश के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के महत्वपूर्ण हिस्से बन चुके हैं। यही कारण है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भारतीय दूतावासों के भीतर रक्षा शाखाओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। डिफेंस अटैची संबंधित देश की सैन्य व्यवस्था, रक्षा जरूरतों और सुरक्षा चुनौतियों को समझने के साथ भारतीय सशस्त्र बलों और वहां की सैन्य संस्थाओं के बीच संवाद को मजबूत करने का काम करता है। अब 20 और देशों में ऐसी शाखाएं स्थापित करने का फैसला बताता है कि भारत अपनी रक्षा कूटनीति को अधिक व्यापक और व्यवस्थित स्वरूप देना चाहता है।
वर्तमान में 52 देशों में भारतीय दूतावासों के साथ रक्षा शाखाएं मौजूद हैं। प्रस्तावित 20 नए देशों को जोड़ने के बाद यह नेटवर्क करीब 72 देशों तक पहुंच जाएगा। यह विस्तार केवल संख्या बढ़ाने की कवायद नहीं है। इसके पीछे व्यापक रणनीतिक सोच है। भारत उन देशों के साथ रक्षा संबंधों को मजबूत करना चाहता है जहां भविष्य में सैन्य सहयोग, रक्षा सामग्री की बिक्री, तकनीकी साझेदारी अथवा सह-उत्पादन की संभावनाएं मौजूद है। विशेष रूप से ऐसे देशों को प्राथमिकता दी जा रही है, जो भारतीय रक्षा सामग्री खरीदने में रुचि रखते हैं, लेकिन वहां फिलहाल भारतीय डिफेंस अटैची तैनात नहीं हैं। इसका सीधा अर्थ है कि भारत रक्षा व्यापार को केवल कारोबारी गतिविधि के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि उसे दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी से जोड़ रहा है।
सरकारी दस्तावेज के अनुसार, इस योजना को दो चरणों में लागू किया जाएगा। पहले चरण में पोलैंड, अल्जीरिया, इथियोपिया और मोजाम्बिक सहित 10 देशों में डिफेंस विंग स्थापित किए जाएंगे। इन देशों का चयन अपने आप में महत्वपूर्ण है। पोलैंड यूरोप की सुरक्षा संरचना में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दूसरी ओर अल्जीरिया, इथियोपिया और मोजाम्बिक अफ्रीकी महाद्वीप में रणनीतिक महत्व रखते हैं। अफ्रीका आज वैश्विक शक्तियों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है। प्राकृतिक संसाधन, समुद्री मार्ग, ऊर्जा, खनिज, बाजार और सामरिक स्थिति के कारण अफ्रीकी देशों के साथ संबंधों को मजबूत करना भारत की विदेश नीति की महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल है। ऐसे में वहां भारतीय रक्षा शाखाओं की स्थापना भारत को स्थानीय सुरक्षा जरूरतों को समझने और रक्षा सहयोग की संभावनाओं को विकसित करने में मदद कर सकती है।
दूसरे चरण में मोरक्को, मैक्सिको, कंबोडिया और रवांडा जैसे देशों को शामिल किया जाएगा। ये देश भौगोलिक रूप से अलग-अलग क्षेत्रों में स्थित हैं, लेकिन भारत की दृष्टि से इनका रणनीतिक महत्व है। मोरक्को उत्तर अफ्रीका में भारत के लिए महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता है। मैक्सिको लैटिन अमेरिका में भारत की पहुंच को मजबूत कर सकता है। कंबोडिया दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की उपस्थिति के विस्तार की संभावनाएं खोलता है, जबकि रवांडा पूर्वी अफ्रीका में भारत के लिए महत्वपूर्ण संपर्क बिंदु बन सकता है। इस प्रकार प्रस्तावित रक्षा नेटवर्क भारत की रक्षा कूटनीति को एशिया से यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका तक विस्तारित करने की दिशा में बड़ा कदम है।
डिफेंस अटैची की भूमिका केवल सैन्य कार्यक्रमों में भाग लेने तक सीमित नहीं होती। वे संबंधित देश के रक्षा प्रतिष्ठानों के साथ संवाद स्थापित करते हैं, सैन्य सहयोग की संभावनाओं का अध्ययन करते हैं और दोनों देशों की सेनाओं के बीच संपर्क को मजबूत बनाते हैं। भारत के लिए यह भूमिका इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अब रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यदि किसी देश को भारतीय मिसाइल प्रणाली, रडार, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, तोपखाने, बख्तरबंद वाहन अथवा अन्य रक्षा प्रणालियों में रुचि है, तो वहां मौजूद रक्षा अधिकारी संभावित सहयोग को संस्थागत रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस तरह दूतावास का डिफेंस विंग कूटनीति और रक्षा उद्योग के बीच सेतु बन सकता है।
भारत लंबे समय तक दुनिया के बड़े रक्षा आयातकों में शामिल रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर बदलने लगी है। भारत का लक्ष्य अब केवल विदेशों से हथियार खरीदना नहीं, बल्कि अपने यहां विकसित और निर्मित रक्षा उपकरणों को दुनिया के बाजारों तक पहुंचाना है। यही वजह है कि रक्षा निर्यात को राष्ट्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। भारत में निर्मित रक्षा प्रणालियों की गुणवत्ता, कीमत और उपयोगिता के कारण कई देशों में इनकी संभावनाएं बढ़ी हैं। मिसाइल, तोप, रडार, बुलेटप्रूफ उपकरण, समुद्री सुरक्षा प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अन्य रक्षा उत्पाद भारतीय रक्षा उद्योग की बढ़ती क्षमता को प्रदर्शित करते हैं। नए डिफेंस विंग इस निर्यात अभियान को जमीन पर मजबूत आधार दे सकते हैं।
आधुनिक रक्षा व्यापार केवल तैयार हथियार बेचने तक सीमित नहीं है। अब दुनिया में ज्वाइंट प्रोडक्शन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और सह-विकास पर जोर है। भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। किसी देश में भारतीय रक्षा शाखा होने से वहां के रक्षा प्रतिष्ठानों, कंपनियों और सैन्य संस्थाओं के साथ नियमित संपर्क कायम करना आसान होगा। भविष्य में किसी देश के साथ संयुक्त रूप से रक्षा उपकरण बनाना, स्थानीय उत्पादन इकाई स्थापित करना या भारतीय तकनीक का इस्तेमाल करना संभव हो सकता है। इससे भारत के रक्षा उद्योग को नया बाजार मिलेगा और साझेदार देशों को भी स्थानीय स्तर पर रोजगार, तकनीकी क्षमता और रक्षा उत्पादन का लाभ मिल सकता है।
भारत की इस पहल का एक बड़ा रणनीतिक पहलू चीन का बढ़ता वैश्विक प्रभाव भी है। अफ्रीका से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका तक चीन पिछले वर्षों में आर्थिक और रणनीतिक संबंधों का विस्तार करता रहा है। बंदरगाह, बुनियादी ढांचा, ऊर्जा परियोजनाएं, ऋण और व्यापार के माध्यम से चीन ने अनेक देशों में अपनी उपस्थिति मजबूत की है। ऐसे वातावरण में भारत के लिए केवल आर्थिक संबंध पर्याप्त नहीं हैं। रक्षा और सुरक्षा सहयोग के माध्यम से भी मित्र देशों के साथ दीर्घकालिक संबंध बनाना आवश्यक हो गया है। भारत की रणनीति चीन के साथ सीधी प्रतिस्पर्धा से अधिक विश्वसनीय और सम्मानजनक साझेदार के रूप में अपनी जगह मजबूत करने की हो सकती है।
अफ्रीका भारत की रक्षा कूटनीति के लिए विशेष महत्व रखता है। भारत और अफ्रीकी देशों के बीच ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक संबंध हैं। भारतीय समुदाय की मौजूदगी ने भी इन रिश्तों को मजबूत आधार दिया है। अफ्रीकी देशों को कम लागत में आधुनिक रक्षा तकनीक, प्रशिक्षण और सुरक्षा सहयोग की आवश्यकता है। भारत इस क्षेत्र में एक भरोसेमंद विकल्प बन सकता है। समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी अभियान, सीमा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और सैन्य प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं। अफ्रीकी देशों में रक्षा शाखाओं की मौजूदगी इन अवसरों को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है।
पोलैंड जैसे देश को प्राथमिकता देना यूरोप में भारत की रक्षा कूटनीति के विस्तार का संकेत है। यूरोप की सुरक्षा परिस्थितियां पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली हैं। ऐसे में रक्षा उद्योग, सैन्य तकनीक और सुरक्षा सहयोग का महत्व बढ़ा है। भारत के लिए यूरोपीय देशों के साथ संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। आधुनिक रक्षा तकनीक, संयुक्त अनुसंधान, समुद्री सुरक्षा और सैन्य अभ्यास जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं भी मौजूद हैं। डिफेंस विंग इन संबंधों को अधिक नियमित और संस्थागत बना सकते हैं।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन की आवश्यकता है। अलग-अलग देशों के साथ मजबूत रक्षा और सुरक्षा संबंध भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति को मजबूत कर सकते हैं। जब कोई देश दूसरे राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था, सैन्य प्रशिक्षण और रक्षा उद्योग के साथ गहरे स्तर पर जुड़ता है, तो दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास भी बढ़ता है। इस दृष्टि से नए डिफेंस विंग केवल रक्षा व्यापार के केंद्र नहीं होंगे। वे भारत की बहुपक्षीय कूटनीति के लिए भी उपयोगी मंच साबित हो सकते हैं। हालांकि संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर किसी देश का समर्थन केवल रक्षा संबंधों से तय नहीं होता। इसके पीछे राजनीतिक, आर्थिक, क्षेत्रीय और रणनीतिक हित भी होते हैं। फिर भी मजबूत रक्षा साझेदारी व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने में योगदान दे सकती है।
भारत की इस नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष छोटे और मध्यम आकार के देशों के साथ संबंध मजबूत करना है। वैश्विक राजनीति में केवल बड़ी शक्तियां ही महत्वपूर्ण नहीं होतीं। छोटे देश भी अंतरराष्ट्रीय संगठनों में मतदान के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय संगठनों और समुद्री मार्गों में उनका रणनीतिक महत्व हो सकता है। इसलिए छोटे देशों के साथ सम्मानजनक और बराबरी पर आधारित रक्षा संबंध भारत की दीर्घकालिक विदेश नीति के लिए उपयोगी हो सकते हैं। भारत का संदेश स्पष्ट हो सकता है साझेदारी आकार देखकर नहीं, साझा हित देखकर होगी।
डिफेंस विंग का सबसे प्रत्यक्ष आर्थिक प्रभाव रक्षा निर्यात पर पड़ सकता है। किसी विदेशी बाजार में रक्षा उपकरण बेचना सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं के निर्यात से अलग होता है। हथियारों की खरीद लंबे समय तक चलने वाला निर्णय होती है। उसमें प्रशिक्षण, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता और भविष्य के उन्नयन की जरूरत होती है। इसलिए ग्राहक देश के साथ लंबे समय का भरोसा आवश्यक होता है। डिफेंस अटैची और रक्षा सलाहकार इस भरोसे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इससे भारतीय कंपनियों को नए बाजारों तक पहुंच बनाने और स्थानीय आवश्यकताओं को समझने में सहायता मिलेगी।
भारत का रक्षा उद्योग अब केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं है। निजी कंपनियां भी रक्षा उत्पादन और निर्यात में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, संचार प्रणाली, मिसाइल तकनीक, बख्तरबंद वाहन और अन्य क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ रही है। विदेशों में मजबूत रक्षा संपर्क इन कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है। यदि किसी देश में भारतीय रक्षा उद्योग के लिए संभावनाएं मौजूद हैं, तो डिफेंस विंग स्थानीय जरूरतों और संभावित साझेदारों की जानकारी उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है। इससे ‘मेक इन इंडिया’ से ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ की यात्रा को गति मिल सकती है।
भारत की विदेश नीति लंबे समय से संवाद, सहयोग और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर आधारित रही है। लेकिन बदलती दुनिया में राष्ट्रीय सुरक्षा का दायरा बहुत व्यापक हो गया है। अब समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आतंकवाद, साइबर हमले, ड्रोन, अंतरिक्ष, आपूर्ति श्रृंखला और महत्वपूर्ण तकनीक भी राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। ऐसे में रक्षा कूटनीति विदेश नीति का अलग-थलग हिस्सा नहीं रह सकती। उसे आर्थिक और राजनीतिक कूटनीति के साथ जोड़ना होगा। 20 नए देशों में डिफेंस विंग स्थापित करने की योजना इसी व्यापक सोच का संकेत है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि रक्षा निर्यात को केवल हथियारों की बिक्री तक सीमित न रखा जाए। भारत की वास्तविक ताकत उसकी विश्वसनीयता, तकनीकी क्षमता और साझेदारी की भावना में है। यदि भारतीय रक्षा कंपनियां प्रतिस्पर्धी कीमत पर गुणवत्तापूर्ण उपकरण उपलब्ध कराती हैं और साथ ही प्रशिक्षण, रखरखाव तथा तकनीकी सहयोग देती हैं, तो विदेशी देशों के साथ लंबे समय के संबंध विकसित किए जा सकते हैं। भारत को यह भी ध्यान रखना होगा कि रक्षा व्यापार में गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक सफल रक्षा सौदा भविष्य के कई समझौतों का रास्ता खोल सकता है, जबकि किसी एक परियोजना की विफलता विश्वास को प्रभावित कर सकती है।
दुनिया में भारत की पहचान तेजी से बदल रही है। कभी भारत को मुख्य रूप से एक बड़े रक्षा आयातक के रूप में देखा जाता था। अब भारत अपने रक्षा उद्योग को वैश्विक बाजार में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। 20 और देशों में डिफेंस विंग की स्थापना इस बदलाव को संस्थागत रूप दे सकती है। यह पहल भारत को तीन स्तरों पर लाभ पहुंचा सकती है। पहला- रक्षा निर्यात में वृद्धि। दूसरा- रणनीतिक साझेदारियों का विस्तार और तीसरा- वैश्विक मंचों पर भारत की कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करना।
अगले पांच वर्ष इस रणनीति के लिए महत्वपूर्ण होंगे। यदि प्रस्तावित डिफेंस विंग प्रभावी ढंग से काम करते हैं तो भारत की रक्षा कूटनीति का नेटवर्क पहले से कहीं व्यापक हो सकता है। अफ्रीका, यूरोप, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया में मजबूत रक्षा संपर्क भारत को नए बाजार और नए साझेदार दे सकते हैं। इससे भारतीय रक्षा उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा और देश की रणनीतिक पहुंच भी बढ़ेगी। लेकिन सफलता केवल डिफेंस अटैची की नियुक्ति से नहीं मिलेगी। इसके लिए रक्षा उद्योग, विदेश मंत्रालय, सशस्त्र बलों, अनुसंधान संस्थानों और निजी कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होगा।
भारत अब अपनी सुरक्षा को केवल सीमा पर तैनात सैनिकों और हथियारों के माध्यम से नहीं देख रहा। आधुनिक युग में मजबूत मित्र देश, भरोसेमंद रक्षा साझेदार, सुरक्षित समुद्री मार्ग, तकनीकी सहयोग और मजबूत रक्षा उद्योग भी राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। 20 और देशों में डिफेंस विंग स्थापित करने की योजना इसी व्यापक सोच का हिस्सा है।
यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया तो भारत के दूतावासों में बैठने वाले रक्षा अधिकारी केवल सैन्य संपर्क अधिकारी नहीं होंगे, बल्कि वे भारतीय रक्षा कूटनीति, रक्षा निर्यात और रणनीतिक साझेदारी के अग्रदूत बन सकते हैं। भारत का लक्ष्य स्पष्ट दिखाई देता है अपनी रक्षा जरूरतों में आत्मनिर्भर बनना, मित्र देशों की सुरक्षा जरूरतों का विश्वसनीय साझेदार बनना और ‘मेड इन इंडिया’ रक्षा उत्पादों को दुनिया के बाजार तक पहुंचाना। यह केवल हथियारों के निर्यात की कहानी नहीं होगी। यह भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव, रणनीतिक आत्मविश्वास और बदलती अंतरराष्ट्रीय भूमिका की कहानी भी होगी। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 20 नए डिफेंस विंग भारत की रक्षा कूटनीति को किस हद तक नई ऊंचाई देते हैं और वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की हिस्सेदारी कितनी बढ़ती है।
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