मुफ्त की रेवड़ियां नहीं - मजबूत कमाई वाली अर्थव्यवस्था होनी चाहिए

मुफ्त की रेवड़ियां नहीं - मजबूत कमाई वाली अर्थव्यवस्था होनी चाहिए

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 18 अगस्त ::
 
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का अपना महत्व है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर समस्या का समाधान मुफ्त वस्तुओं और नकद सहायता के वितरण में खोजा जाना चाहिए? क्या सरकारों की जिम्मेदारी केवल लोगों को राहत देना है या ऐसी अर्थव्यवस्था बनाना भी है, जिसमें आम आदमी की आय इतनी तेजी से बढ़े कि वह महंगाई का मुकाबला कर सके? आज भारत के सामने सबसे बड़ी जरूरत मुफ्त की रेवड़ियों का दायरा बढ़ाने की नहीं है, बल्कि रोजगार, आय, उत्पादकता और अवसरों को बढ़ाने वाली अर्थव्यवस्था तैयार करने की है। ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसमें गरीब परिवार गरीबी से बाहर निकल सके, मध्यवर्ग आर्थिक दबाव से राहत महसूस कर सके और मेहनत करने वाले व्यक्ति को अपनी मेहनत का सम्मानजनक प्रतिफल मिल सके।

चुनावी राजनीति में मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त राशन, नकद सहायता, मुफ्त यात्रा, लैपटॉप, साइकिल या दूसरी सुविधाओं की घोषणाएं मतदाताओं को आकर्षित कर सकती हैं। कई योजनाएं वास्तव में जरूरतमंदों के लिए राहत का काम भी करती हैं। लेकिन जब मुफ्त वितरण राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का स्थायी माध्यम बन जाता है, तब इसके आर्थिक प्रभाव पर गंभीर चर्चा आवश्यक हो जाती है। सरकार के पास पैसा कोई जादुई स्रोत नहीं है। सरकार जो खर्च करती है, उसका बड़ा हिस्सा अंततः जनता से प्राप्त करों, शुल्कों और अन्य राजस्व स्रोतों से आता है। इसलिए सरकारी धन के प्रत्येक रुपये का उपयोग सोच-समझकर होना चाहिए। जरूरतमंद व्यक्ति को सहायता देना और पूरी आबादी को लगातार मुफ्त सुविधाओं का आदी बनाना, इन दोनों में बड़ा अंतर है। पहली व्यवस्था सामाजिक सुरक्षा हो सकती है, जबकि दूसरी व्यवस्था लंबे समय में आर्थिक निर्भरता पैदा कर सकती है।

देश में लाखों लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करों का भुगतान करते हैं। वेतनभोगी कर्मचारी अपनी आय पर कर देते हैं, कारोबारी और उद्यमी विभिन्न करों का भुगतान करते हैं तथा आम उपभोक्ता रोजमर्रा की वस्तुओं और सेवाओं पर अप्रत्यक्ष कर देता है। इसलिए सरकार के पास उपलब्ध धन वास्तव में जनता का धन है। इस धन का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सिंचाई, परिवहन, सुरक्षा, रोजगार सृजन और आधारभूत ढांचे के निर्माण में किया जाए तो उसका प्रभाव लंबे समय तक दिखाई देता है। इसके विपरीत यदि सीमित संसाधनों का बड़ा हिस्सा ऐसी योजनाओं में खर्च हो, जिनसे दीर्घकालिक उत्पादक क्षमता नहीं बढ़ती है, तो सरकार के पास विकास कार्यों के लिए संसाधन कम पड़ सकते हैं। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सरकार गरीबों की मदद करे या नहीं। सवाल यह होना चाहिए कि मदद का ऐसा मॉडल क्या हो, जो आज राहत दे और कल व्यक्ति को आत्मनिर्भर भी बनाए।

गरीबी केवल आय की कमी का नाम नहीं है। गरीबी का संबंध शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, रोजगार, आवास, पोषण और अवसरों से भी है। यदि किसी गरीब परिवार को कुछ समय के लिए आर्थिक सहायता मिलती है और उसी के साथ उसके परिवार के बच्चों को अच्छी शिक्षा, युवाओं को कौशल प्रशिक्षण तथा परिवार के वयस्कों को रोजगार मिलता है, तो सहायता विकास का माध्यम बन जाती है। लेकिन यदि सहायता केवल वितरण तक सीमित रह जाए और व्यक्ति के पास स्थायी आय का साधन न बने, तो समस्या का मूल समाधान नहीं होता है। जरूरत इस बात की है कि गरीब परिवारों को मुफ्त की वस्तुओं से ज्यादा कमाने के अवसर मिले। उन्हें ऐसा कौशल मिले जिससे वे बाजार में अपनी सेवाएं बेच सके। छोटे कारोबार के लिए पूंजी मिले। किसानों को बेहतर तकनीक, सिंचाई और बाजार मिले। युवाओं को रोजगार मिले और महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी के अवसर मिले। यही वास्तविक आत्मनिर्भरता है।

रेवड़ी की चर्चा अक्सर गरीबों के संदर्भ में होती है, लेकिन मध्यवर्ग की आर्थिक चुनौतियों पर भी ध्यान देना जरूरी है। मध्यवर्ग परिवार की आय बढ़ती जरूर है, लेकिन उसके साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान, परिवहन, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च भी बढ़ता रहता है। कई परिवारों के सामने स्थिति यह है कि वे सरकारी सहायता के पात्र नहीं होते हैं, लेकिन महंगाई का दबाव लगातार महसूस करते हैं। वे टैक्स भी देते हैं और अपनी अधिकांश जरूरतों का खर्च भी स्वयं उठाते हैं। इसलिए आर्थिक नीति का लक्ष्य केवल गरीबों को राहत देना नहीं होना चाहिए। मध्यवर्ग की वास्तविक आय बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी कर्मचारी का वेतन सालाना 8 प्रतिशत बढ़ता है, लेकिन उसकी आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की लागत उससे अधिक तेजी से बढ़ती है, तो कागज पर आय बढ़ने के बावजूद उसकी क्रय शक्ति कमजोर हो सकती है। यही कारण है कि महंगाई को नियंत्रित रखने के साथ-साथ आय और उत्पादकता बढ़ाना जरूरी है।

किसी गरीब परिवार को हर महीने कुछ हजार रुपये देना निश्चित रूप से तत्काल राहत दे सकता है। लेकिन उसी परिवार के एक सदस्य को स्थायी रोजगार मिल जाए तो उसका प्रभाव कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है। रोजगार व्यक्ति को केवल आय नहीं देता है, बल्कि आत्मसम्मान, निर्णय लेने की क्षमता और भविष्य की योजना बनाने का अवसर भी देता है। इसलिए सरकारों को ऐसी अर्थव्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए जिसमें बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो। विनिर्माण, निर्माण, पर्यटन, कृषि-प्रसंस्करण, सेवा क्षेत्र, डिजिटल अर्थव्यवस्था, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और छोटे उद्योग रोजगार के बड़े स्रोत बन सकते हैं। मुफ्त सामान खत्म होने के बाद भी रोजगार से मिलने वाली आय बनी रहती है।

भारत की आर्थिक शक्ति केवल बड़ी कंपनियों में नहीं है। छोटे दुकानदार, कारीगर, किसान, स्वरोजगार करने वाले लोग, छोटे उद्योगपति और सेवा क्षेत्र से जुड़े लाखों लोग अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यदि सरकार गरीब और निम्न-मध्यवर्गीय लोगों को छोटे व्यवसाय शुरू करने में मदद करे, उन्हें आसान ऋण, प्रशिक्षण, बाजार और डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध कराए, तो सरकारी सहायता आर्थिक गतिविधि में बदल सकती है। एक व्यक्ति को लगातार सहायता देने के बजाय उसे छोटा कारोबार खड़ा करने में मदद करना अधिक टिकाऊ रास्ता हो सकता है। एक सिलाई मशीन, कौशल प्रशिक्षण, छोटा ऋण और बाजार तक पहुंच किसी परिवार की आर्थिक दिशा बदल सकती है। इसी तरह किसान को केवल सब्सिडी देने के बजाय प्रसंस्करण, भंडारण और बाजार की सुविधा देने से उसकी आय में स्थायी वृद्धि हो सकती है।

राजनीति में ऐसी घोषणाएं लोकप्रिय होती हैं जिनका लाभ तुरंत दिखाई देता है। लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए उन फैसलों की जरूरत होती है जिनका परिणाम पांच, दस या बीस साल बाद दिखाई देता है। एक नया स्कूल, आधुनिक अस्पताल, सिंचाई परियोजना, औद्योगिक क्षेत्र, बेहतर सड़क, रेलवे नेटवर्क, कौशल केंद्र या शोध संस्थान तत्काल राजनीतिक लाभ नहीं देता, लेकिन लंबे समय में देश की आर्थिक क्षमता बढ़ाता है। इसीलिए राजनीति को मुफ्त वितरण से निवेश की राजनीति की ओर बढ़ना होगा। जनता को भी यह समझना होगा कि सरकार की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसने क्या मुफ्त दिया। यह भी देखना चाहिए कि उसने कितने रोजगार पैदा किए, कितने उद्योग लगाए, कितने स्कूल और अस्पताल बेहतर किए और नागरिकों की आय बढ़ाने के लिए क्या किया।

यह कहना भी गलत होगा कि हर सरकारी सहायता योजना खराब है। समाज में ऐसे लोग होते हैं जो वास्तव में सहायता के बिना जीवन नहीं चला सकते। बुजुर्ग, दिव्यांग, अत्यंत गरीब परिवार और आपदा से प्रभावित लोग सामाजिक सुरक्षा के हकदार हैं। समस्या सहायता में नहीं, बल्कि सहायता के डिजाइन और उद्देश्य में हो सकती है। सरकार को ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए जो लक्षित, पारदर्शी और आर्थिक रूप से टिकाऊ हो। जहां संभव हो, सहायता को शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, रोजगार और आत्मनिर्भरता से जोड़ा जा सकता है। इससे सरकारी सहायता व्यक्ति को स्थायी रूप से निर्भर बनाने के बजाय आगे बढ़ने की सीढ़ी बन सकती है।

किसी भी देश की आर्थिक प्रगति उसके नागरिकों की मेहनत, कौशल और उत्पादकता पर निर्भर करती है। यदि समाज में यह धारणा मजबूत होने लगे कि काम करने के बजाय सरकारी सहायता पर निर्भर रहना ज्यादा आसान है, तो इसका दीर्घकालिक असर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि बेरोजगारी या गरीबी को केवल व्यक्ति की इच्छा से जोड़ना उचित नहीं है। जब रोजगार के पर्याप्त अवसर ही उपलब्ध न हों तो व्यक्ति को दोष देना समाधान नहीं है। इसलिए काम करने की संस्कृति के साथ काम के अवसर पैदा करना भी सरकार की जिम्मेदारी है। जहां रोजगार उपलब्ध है, वहां कौशल और उत्पादकता बढ़ानी होगी। जहां रोजगार नहीं है, वहां निवेश और उद्योग लाने होंगे।

भारत को आने वाले दशकों में दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह और मजबूत करनी है। इसके लिए करोड़ों लोगों की आय बढ़ानी होगी। केवल सरकारी योजनाओं के सहारे यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता है। देश को ऐसी आर्थिक व्यवस्था चाहिए जिसमें गुणवत्तापूर्ण रोजगार तेजी से बढ़े। छोटे और मध्यम उद्योग मजबूत हो। किसानों की उत्पादकता और आय बढ़े। युवाओं को बाजार आधारित कौशल मिले। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़े। शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रभावी निवेश हो। महंगाई नियंत्रण में रहे। बुनियादी ढांचा मजबूत हो। कारोबार शुरू करना और चलाना आसान हो। निजी निवेश और सार्वजनिक निवेश दोनों बढ़े। जब ये चीजें मजबूत होगी, तब सरकार की सहायता पर निर्भरता स्वाभाविक रूप से कम होगी।

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना जनता का अधिकार है। लेकिन सवाल यह भी होना चाहिए कि हमें सरकार से क्या चाहिए? क्या हमें हर साल नई मुफ्त घोषणा चाहिए या ऐसा रोजगार चाहिए जिससे परिवार अपनी जरूरतें स्वयं पूरी कर सके? क्या हमें मुफ्त बिजली की सीमा बढ़ाने की जरूरत है या ऐसी आय चाहिए जिससे बिजली का बिल आसानी से चुकाया जा सके? क्या हमें बार-बार नकद सहायता चाहिए या ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें वेतन और स्वरोजगार की आय महंगाई से तेज बढ़े? यही बहस भारत के आर्थिक भविष्य को दिशा दे सकती है।

भारत को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें गरीब को गरीबी से निकलने का रास्ता मिले और मध्यवर्ग को आर्थिक सुरक्षा का भरोसा। जरूरतमंदों के लिए सामाजिक सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा और स्थायी निर्भरता को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता है। सरकार का लक्ष्य यह होना चाहिए कि सहायता पाने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा हो। उसे शिक्षा मिले, कौशल मिले, रोजगार मिले, व्यवसाय का अवसर मिले और अपनी मेहनत से आय बढ़ाने का रास्ता मिले। मुफ्त की रेवड़ियां किसी परिवार को कुछ समय के लिए राहत दे सकती हैं, लेकिन मजबूत आय ही उसके भविष्य को बदल सकती है।

टैक्सपेयर के पैसे का सर्वोत्तम उपयोग वह है जिससे देश की उत्पादक क्षमता बढ़े, रोजगार पैदा हो और नागरिकों की कमाई मजबूत हो। भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जहां गरीब सहायता का पात्र बने तो इसलिए कि वह कठिन परिस्थिति में है, न कि इसलिए कि उसकी आत्मनिर्भरता की संभावना समाप्त हो गई है। अंततः राष्ट्र की आर्थिक मजबूती इस बात से तय होगी कि कितने लोग सरकारी खैरात पर निर्भर हैं, इससे नहीं, बल्कि इस बात से कि कितने लोग सम्मानजनक रोजगार और अपनी मेहनत की कमाई के बल पर आत्मनिर्भर जीवन जी रहे हैं। भारत के भविष्य की असली रेवड़ी कोई मुफ्त सुविधा नहीं है, बल्कि हर हाथ में काम, हर परिवार की बढ़ती आय और हर मेहनतकश नागरिक के लिए आर्थिक अवसर है। यही रास्ता देश को आर्थिक रूप से मजबूत, आत्मनिर्भर और टिकाऊ विकास की ओर ले जा सकता है।
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