नेपाल की बाढ़ - बिहार के लिए खतरे की चेतावनी

नेपाल की बाढ़ - बिहार के लिए खतरे की चेतावनी

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 28 अगस्त ::
 
नेपाल के भोटे कोशी नदी में आई बाढ़ से मची तबाही के दृश्य दिल दहला देने वाले हैं। पहाड़ों से उतरता पानी जब अपने साथ मलबा, चट्टानें और तेज बहाव लेकर नीचे आता है, तो कुछ ही घंटों में बस्तियों, सड़कों, पुलों और खेतों को अपनी चपेट में ले लेता है। नेपाल में सामने आई यह त्रासदी केवल एक पड़ोसी देश की प्राकृतिक आपदा भर नहीं है। यह बिहार के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। खासकर उत्तर बिहार के लिए, जहां नदियों का एक बड़ा तंत्र नेपाल के पहाड़ी और तराई क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। नेपाल और बिहार के बीच की भौगोलिक निकटता दोनों क्षेत्रों को नदियों के माध्यम से जोड़ती है। नेपाल में होने वाली अत्यधिक वर्षा, बादल फटना, भूस्खलन या अचानक आने वाली बाढ़ का प्रभाव सीमा पार बिहार तक पहुंच सकता है। इसलिए नेपाल में नदी का उफान केवल नेपाल की समस्या नहीं रहता। उसका असर भारत में प्रवेश करने वाली नदियों के जलस्तर, प्रवाह और जलग्रहण क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।

बिहार की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उत्तर में नेपाल की पहाड़ियों से निकलने वाली कई नदियां राज्य के मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती हैं। नेपाल के पहाड़ी इलाकों में जब भारी बारिश होती है, तो वहां की नदियां तेजी से उफनती हैं। पहाड़ों की ढलान और नदी की तेज गति के कारण पानी बहुत कम समय में नीचे के क्षेत्रों की ओर बढ़ता है। बिहार का मैदान अपेक्षाकृत समतल है। इसलिए पहाड़ों से तेजी से आने वाला पानी यहां पहुंचने के बाद अपेक्षाकृत धीमी गति से फैलता है। नदी का जलस्तर बढ़ने पर उसके किनारे बसे गांव, खेत और निचले इलाके जलमग्न होने लगते हैं। यही कारण है कि नेपाल में होने वाली अत्यधिक बारिश और बाढ़ को बिहार में रहने वाले लोगों के लिए गंभीरता से देखना आवश्यक है। हालांकि यह समझना भी जरूरी है कि नेपाल में आई हर बाढ़ का मतलब पूरे बिहार में बाढ़ नहीं होता है। इसका प्रभाव कई बातों पर निर्भर करता हैकि बाढ़ किस नदी के जलग्रहण क्षेत्र में आई है, उस क्षेत्र में कितनी बारिश हुई है, नदी में कितना पानी आया है, पानी का बहाव किस दिशा में है और बिहार में उस समय नदी की स्थिति क्या है। इसलिए नेपाल की किसी भी बाढ़ को बिहार के लिए सीधे राज्यव्यापी बाढ़ की घोषणा के रूप में देखना सही नहीं होगा। लेकिन जिस नदी का जलग्रहण क्षेत्र प्रभावित हुआ है, उसके बिहार वाले हिस्से में खतरा निश्चित रूप से बढ़ सकता है।

उत्तर बिहार के लिए गंडक नदी विशेष महत्व रखती है। नेपाल में इसका ऊपरी प्रवाह और जलग्रहण क्षेत्र होने के कारण वहां की वर्षा का प्रभाव नदी के जलस्तर पर पड़ता है। नेपाल में भारी बारिश होने पर गंडक प्रणाली में पानी बढ़ सकता है और इसका असर बिहार के सीमावर्ती तथा नदी किनारे के इलाकों पर पड़ सकता है। नारायणी नदी नेपाल में गंडक नदी प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है और नदियों का प्रवाह असामान्य रूप से बढ़ता है, तो उसका असर नीचे की ओर बिहार तक पहुंचने की संभावना रहती है। ऐसी स्थिति में पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज और मुजफ्फरपुर जैसे जिलों पर विशेष निगरानी की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि इन सभी जिलों में निश्चित रूप से बाढ़ आ जाएगी, लेकिन गंडक प्रणाली में पानी बढ़ने पर इन क्षेत्रों में जोखिम बढ़ सकता है। यही वह भौगोलिक वास्तविकता है जिसे बिहार की बाढ़ नीति और आपदा प्रबंधन में हमेशा ध्यान में रखना होता है।

बिहार को अक्सर नदियों का प्रदेश कहा जाता है। यहां की नदियां राज्य की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए वरदान भी हैं और बाढ़ के समय चुनौती भी बन जाती हैं। उत्तर बिहार की कई प्रमुख नदियों का संबंध नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों से है। कोसी, गंडक, बागमती, कमला बलान और महानंदा जैसी नदी प्रणालियां नेपाल और बिहार के बीच प्राकृतिक संपर्क बनाती हैं। नेपाल की पहाड़ियों में होने वाली बारिश इन नदियों के प्रवाह को प्रभावित कर सकती है। विशेष रूप से कोसी नदी का इतिहास बिहार के लिए अत्यंत संवेदनशील रहा है। कोसी को लंबे समय से बिहार की बाढ़ की सबसे बड़ी चुनौतियों में गिना जाता है। इसी तरह गंडक और बागमती भी उत्तर बिहार के अनेक जिलों की भौगोलिक और सामाजिक जिंदगी से जुड़ी हुई हैं। नदियां अपने साथ केवल पानी नहीं लातीं। वे पहाड़ों से मिट्टी और गाद भी लेकर आती हैं। लंबे समय में यही गाद नदी की तलहटी को प्रभावित करती है। नदी की जलधारण क्षमता कम होने पर सामान्य से कम अतिरिक्त पानी भी कई बार आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगता है।

भोटे कोशी नदी में आई बाढ़ ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि पहाड़ी क्षेत्रों में बदलता मौसम और अत्यधिक वर्षा आने वाले समय में कितनी बड़ी चुनौती बन सकती है। पहाड़ों में कम समय में बहुत अधिक बारिश होने की घटनाएं अचानक बाढ़ का कारण बन सकती है। ऐसी बाढ़ का सबसे खतरनाक पहलू इसकी गति है। मैदानी इलाकों में बाढ़ कई बार धीरे-धीरे बढ़ती है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में पानी अचानक उफान पर आ सकता है। इसके साथ मलबा और चट्टानें आने से पुल, सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान हो सकता है। यदि ऐसी स्थिति किसी ऐसी नदी प्रणाली में उत्पन्न होती है जिसका जलग्रहण क्षेत्र बिहार से जुड़ा है, तो नीचे के मैदानी इलाकों के लिए खतरा बढ़ जाता है। यही कारण है कि नेपाल की मौजूदा त्रासदी को बिहार के लिए भविष्य की चेतावनी के रूप में देखना चाहिए।

बाढ़ की समस्या को केवल पारंपरिक मानसूनी वर्षा से जोड़कर देखना अब पर्याप्त नहीं है। मौसम के बदलते स्वरूप ने आपदा प्रबंधन की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। कम समय में अत्यधिक वर्षा, बादल फटना और अत्यधिक बारिश की घटनाएं नदी प्रणालियों पर अचानक दबाव डाल सकती हैं। नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों और बिहार के मैदानी इलाकों की भौगोलिक संरचना अलग है, लेकिन दोनों का जल तंत्र एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। इसलिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन सीमा के दोनों ओर मिलकर करना जरूरी है। बिहार के लिए चुनौती यह है कि यहां बड़ी आबादी नदी किनारे और बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहती है। लाखों लोगों की आजीविका कृषि पर निर्भर है। बाढ़ आने पर खेतों में लगी फसल, पशुधन, घर, सड़क और स्थानीय बाजार प्रभावित होते हैं। इसलिए किसी बड़ी बाढ़ का प्रभाव केवल कुछ दिनों के जलभराव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि महीनों तक आर्थिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर सकता है।

नेपाल और भारत के बीच नदियों को लेकर सहयोग कोई नई आवश्यकता नहीं है, लेकिन बदलती परिस्थितियों में इसे और मजबूत करने की जरूरत है। सीमा पार नदी तंत्र में वास्तविक समय की सूचना साझा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में बारिश की स्थिति, नदी का जलस्तर, संभावित अचानक बाढ़ और जलप्रवाह की जानकारी बिहार के संबंधित अधिकारियों तक समय रहते पहुंचनी चाहिए। इसके आधार पर बिहार में संवेदनशील जिलों को पहले से सतर्क किया जा सकता है। सिर्फ बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। आधुनिक आपदा प्रबंधन का लक्ष्य बाढ़ आने से पहले लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना होना चाहिए। इसके लिए स्थानीय प्रशासन, जल संसाधन विभाग, आपदा प्रबंधन तंत्र और ग्रामीण समुदायों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।

बिहार में बाढ़ नियंत्रण के लिए तटबंधों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल तटबंधों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता। नदी का व्यवहार लगातार बदलता है। अत्यधिक दबाव की स्थिति में तटबंधों पर भी खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए नदी के जलस्तर की लगातार निगरानी, संवेदनशील तटबंधों की नियमित जांच और समय रहते मरम्मत जरूरी है। इसके साथ गांव स्तर तक प्रभावी चेतावनी प्रणाली पहुंचानी होगी। यदि किसी क्षेत्र में नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है तो वहां रहने वाले लोगों को समय रहते मोबाइल संदेश, सायरन, स्थानीय प्रशासन और पंचायत स्तर के माध्यम से जानकारी मिलनी चाहिए। चेतावनी ऐसी भाषा और माध्यम में हो जिसे ग्रामीण आसानी से समझ सके।

बिहार के लिए यह भी समझना जरूरी है कि बाढ़ को पूरी तरह समाप्त करना हमेशा संभव नहीं होगा। नदियां प्राकृतिक प्रणाली का हिस्सा हैं। इसलिए बाढ़ नियंत्रण के साथ बाढ़ के प्रभाव को कम करने की रणनीति भी जरूरी है। ऊंचे स्थानों पर सुरक्षित आश्रय स्थल, नावों की पर्याप्त व्यवस्था, पशुओं के लिए सुरक्षित स्थान, आवश्यक दवाओं और खाद्यान्न का भंडार तथा संचार व्यवस्था पहले से तैयार रहनी चाहिए। बाढ़ प्रभावित गांवों में लोगों को यह जानकारी भी दी जानी चाहिए कि आपदा की स्थिति में क्या करना है और क्या नहीं करना है। स्कूल, पंचायत भवन और सामुदायिक केंद्रों को आवश्यकता पड़ने पर राहत केंद्र के रूप में उपयोग करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

नेपाल में भोटे कोशी की बाढ़ ने जो दृश्य दिखाए हैं, उन्हें केवल तस्वीरों और समाचारों तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। वे हमें यह सोचने के लिए मजबूर करते हैं कि सीमा पार की प्राकृतिक आपदा किस तरह बिहार के लिए खतरे का संकेत बन सकती है। नेपाल की त्रासदी बिहार के लिए भविष्य की एक डरावनी तस्वीर इसलिए है क्योंकि दोनों क्षेत्रों की नदी प्रणालियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। लेकिन इस डर को घबराहट में बदलने के बजाय तैयारी में बदलना होगा। बिहार को हर बड़ी बारिश के दौरान नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों की स्थिति पर नजर रखनी होगी। नदीवार जोखिम का आकलन करना होगा। किस नदी में कितना पानी आने पर कौन-सा इलाका प्रभावित हो सकता है, इसका वैज्ञानिक नक्शा तैयार होना चाहिए। संवेदनशील गांवों की सूची अद्यतन होनी चाहिए और राहत एवं बचाव की व्यवस्था पहले से तैयार रहनी चाहिए।

नेपाल की पहाड़ियों में उठने वाला पानी बिहार के मैदानी इलाकों तक पहुंचते-पहुंचते केवल एक नदी का प्रवाह नहीं रहता, बल्कि वह लाखों लोगों की जिंदगी और आजीविका को प्रभावित करने वाली चुनौती बन सकता है। यही कारण है कि नेपाल की बाढ़ को बिहार से अलग करके देखना संभव नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हर नेपाली बाढ़ को पूरे बिहार के लिए संकट मान लेना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। वास्तविक खतरा नदी के जलग्रहण क्षेत्र, बारिश की मात्रा, जलप्रवाह और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसलिए समाधान डर में नहीं, सतर्कता, वैज्ञानिक निगरानी और समय पर कार्रवाई में है। 

नेपाल में आई भोटे कोशी की बाढ़ बिहार को यही संदेश देती है कि प्राकृतिक आपदाएं सीमा नहीं पहचानती है। जब नदी का पानी सीमा पार कर सकता है, तो आपदा प्रबंधन की तैयारी भी सीमा से आगे जाकर होनी चाहिए। नेपाल और बिहार के बीच बेहतर जल-सूचना साझेदारी, आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली, मजबूत तटबंध निगरानी और स्थानीय स्तर पर तैयार आपदा प्रबंधन तंत्र ही आने वाले वर्षों में बाढ़ के खतरे को कम कर सकता है। आज नेपाल में दिखाई दे रही तबाही को यदि बिहार ने गंभीर चेतावनी के रूप में लिया, तो कल की बड़ी त्रासदी को काफी हद तक टाला जा सकता है। नदी को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके खतरे को समझकर समय रहते जीवन बचाया जा सकता है।
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