क्या सोनिया गांधी की ‘Belonging’ बनेगी नया राजनीतिक दस्तावेज?

क्या सोनिया गांधी की ‘Belonging’ बनेगी नया राजनीतिक दस्तावेज?

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 31 अगस्त ::
 
“लिखना” केवल शब्दों का पुष्प भर नहीं होता है। यह व्यक्ति के मन में उठे विचार, अनुभव, भावनाओं, हालात और सवालों का ऐसा गुलदस्ता होता है, जिसमें गरल भी होता है और अमृत भी, हकीकत भी होती है और फसाना भी, व्यथा भी होती है और यथार्थ भी। सत्य के फूलों के साथ मिथ्या के पुष्प भी उसमें गुथे हो सकते हैं। इसलिए हर लेखन अपने भीतर केवल शब्द नहीं, बल्कि लेखक की दृष्टि, अनुभव और समय की छाप लेकर चलता है।

लेखक जब कलम उठाता है तो वह सिर्फ यह तय नहीं करता है कि क्या लिखना है, बल्कि उसके सामने यह सवाल भी होता है कि उसके लिखे का प्रभाव क्या होगा और उससे प्रभावित कौन-कौन होंगे। यही वजह है कि सामान्य लेख, कहानी या कविता की तुलना में किताब और आत्मकथा का महत्व कहीं अधिक हो जाता है। आत्मकथा में व्यक्ति अपने जीवन की कहानी लिखता जरूर है, लेकिन उसके साथ वह अपने समय, समाज, संबंधों, संघर्षों और सत्ता-संरचनाओं का भी दस्तावेज तैयार कर देता है।

इसी संदर्भ में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और लंबे समय तक भारतीय राजनीति के केंद्र में रही सोनिया गांधी की पुस्तक Belonging: A Journey of Love को लेकर उठती चर्चाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं। यह पुस्तक यदि अपने घोषित दायरे के अनुरूप व्यक्तिगत जीवन, संबंधों और राजनीतिक अनुभवों को समेटती है, तो स्वाभाविक रूप से इसमें भारतीय राजनीति के कई ऐसे प्रसंग भी आ सकते हैं, जिनका संबंध केवल एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि देश के राजनीतिक इतिहास से है। यही कारण है कि इस पुस्तक को केवल एक आत्मकथात्मक रचना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके इर्द-गिर्द उठने वाले सवाल हमें एक बड़े विमर्श की ओर ले जाते हैं कि क्या किताब आज भी सत्ता और स्थापित राजनीतिक आख्यानों को चुनौती देने का सबसे प्रभावी माध्यम है? और लेखक की आवाज तथा प्रकाशक की संपादकीय जिम्मेदारी के बीच सीमा आखिर कहां निर्धारित होती है?

किसी राजनीतिक व्यक्ति की आत्मकथा कभी पूरी तरह निजी नहीं रह जाती। विशेषकर तब, जब वह व्यक्ति दशकों तक देश की सत्ता के गलियारों में प्रभावशाली भूमिका निभाता रहा हो। सोनिया गांधी का सार्वजनिक जीवन भारतीय राजनीति के कई निर्णायक दौरों से जुड़ा रहा है। राजीव गांधी के साथ उनका जीवन, नेहरू-गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत, 1990 के दशक की कांग्रेस राजनीति, गठबंधन सरकारों का दौर और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानि यूपीए की राजनीति, इन सभी घटनाओं से उनका नाम किसी न किसी रूप में जुड़ा रहा है। इसलिए यदि वे अपने जीवन के अनुभवों को अपने दृष्टिकोण से दर्ज करती है, तो वह केवल स्मृतियों का संकलन नहीं रहेगा। वह एक वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोण भी बन सकता है। इतिहास में अक्सर घटनाएं वही रहती है, लेकिन उन्हें देखने वाले लोगों के नजरिए बदल जाते हैं। एक नेता जिस घटना को राजनीतिक उपलब्धि मानता है, उसका प्रतिद्वंद्वी उसे राजनीतिक विफलता कह सकता है। एक व्यक्ति किसी निर्णय को त्याग मान सकता है, तो दूसरा उसी निर्णय को रणनीति के रूप में देख सकता है। आत्मकथा इसी अंतर को सामने लाती है।

सत्ता के पास संस्थाएं होती हैं, सरकारी रिकॉर्ड होते हैं, आधिकारिक वक्तव्य होते हैं और इतिहास को प्रभावित करने की क्षमता होती है। लेकिन लेखक के पास एक दूसरी ताकत होती है “उसकी स्मृति और उसकी कलम”। सत्ता किसी घटना का आधिकारिक संस्करण प्रस्तुत कर सकती है, लेकिन कोई लेखक उसी घटना का निजी अनुभव सामने रख सकता है। यही वह बिंदु है जहां किताब सत्ता के समानांतर खड़े एक दस्तावेज का रूप लेने लगती है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि किताब में लिखा हर शब्द अंतिम सत्य होता है। लेखक भी मनुष्य है। उसकी अपनी स्मृतियां हैं, पूर्वाग्रह हैं, पसंद-नापसंद हैं और घटनाओं को देखने का अपना कोण है। इसलिए आत्मकथा को इतिहास की अंतिम अदालत मानना भी उचित नहीं होगा। लेकिन उसका महत्व इस बात में है कि वह एक दूसरा रिकॉर्ड उपलब्ध कराती है। यही दूसरा रिकॉर्ड लोकतांत्रिक समाज में बेहद महत्वपूर्ण होता है।

Belonging: A Journey of Love को लेकर चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण प्रतीत होता है कि सोनिया गांधी की कहानी व्यक्तिगत होते हुए भी भारतीय राजनीति के एक बड़े कालखंड से जुड़ती है। एक विदेशी मूल की महिला का भारत आना, भारतीय परिवार में विवाह, नेहरू-गांधी परिवार में प्रवेश, राजीव गांधी की पत्नी के रूप में सार्वजनिक जीवन का अनुभव, पति की हत्या के बाद की परिस्थितियां और बाद में भारतीय राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका। यह पूरा सफर अपने आप में आधुनिक भारत की असाधारण राजनीतिक-सामाजिक कहानी है। इस कहानी में प्रेम है, निजी पीड़ा है, परिवार है, राजनीति है, सत्ता है और संघर्ष भी है। यदि पुस्तक इन अनुभवों को विस्तार से दर्ज करती है तो पाठक को केवल सोनिया गांधी के जीवन की कहानी नहीं मिलेगी, बल्कि उस दौर के भारत की भी एक तस्वीर मिलेगी। यही कारण है कि इस पुस्तक को लेकर उठने वाले विवादों को केवल राजनीतिक विवाद मानना शायद उचित नहीं होगा।

इतिहास गवाह है कि कई किताबें अपने समय में विवादों के घेरे में रही हैं। कभी किसी किताब पर प्रतिबंध लगाने की मांग हुई, कभी उसके लेखक पर मुकदमे हुए, कभी प्रकाशक पर दबाव पड़ा और कभी किताब के कुछ अंशों को लेकर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आई। लेकिन कई बार विवाद किताब की लोकप्रियता को और बढ़ा देता है। क्यों? क्योंकि प्रतिबंध, विरोध और आलोचना पाठक के मन में एक स्वाभाविक सवाल पैदा करते हैं कि आखिर इसमें ऐसा क्या लिखा है? लोकतंत्र में असहमति से डरने के बजाय उससे संवाद करना अधिक महत्वपूर्ण है। किताब का उत्तर किताब से देना, तर्क का उत्तर तर्क से देना और इतिहास का उत्तर बेहतर इतिहास से देना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा मानी जा सकती है। इस दृष्टि से विवादित पुस्तकें केवल साहित्यिक घटनाएं नहीं होतीं। वे समाज में विचारों की टकराहट का माध्यम भी बन जाती हैं।

किसी भी पुस्तक के निर्माण में लेखक अकेला नहीं होता है। उसके साथ संपादक और प्रकाशक भी होते हैं। खासकर राजनीतिक आत्मकथा के मामले में संपादकीय जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। लेखक का अधिकार है कि वह अपने अनुभव और विचार पूरी ईमानदारी से दर्ज करे। लेकिन प्रकाशक की जिम्मेदारी है कि पुस्तक में प्रकाशित दावों, आरोपों और तथ्यों को लेकर आवश्यक संपादकीय सावधानी बरती जाए। यहीं सबसे कठिन सवाल पैदा होता है कि क्या संपादक लेखक की आवाज को बदल सकता है? यदि संपादक अत्यधिक हस्तक्षेप करता है तो लेखक की मौलिक आवाज कमजोर हो सकती है। लेकिन यदि संपादक बिल्कुल हस्तक्षेप न करे तो तथ्यात्मक त्रुटियां, अस्पष्ट दावे या विवादित आरोप बिना पर्याप्त संदर्भ के प्रकाशित हो सकते हैं। इसलिए संपादकीय प्रक्रिया का उद्देश्य लेखक की आवाज दबाना नहीं है, बल्कि उसे अधिक विश्वसनीय और स्पष्ट बनाना होना चाहिए।

आत्मकथा का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि स्मृति हमेशा सत्य के समान नहीं होती है। मनुष्य की स्मृति चयनात्मक होती है। कुछ घटनाएं वर्षों बाद भी स्पष्ट रहती हैं, जबकि कुछ धुंधली पड़ जाती हैं। व्यक्ति अपने अनुभवों को अपनी भावनाओं के साथ याद करता है। इसलिए आत्मकथा में व्यक्तिगत सत्य और ऐतिहासिक सत्य के बीच अंतर हो सकता है। सोनिया गांधी हों या कोई अन्य राजनेता, उनकी आत्मकथा को पढ़ते समय पाठक को इस अंतर को समझना होगा। किसी संस्मरण में लेखक कह सकता है कि किसी घटना से उसे ऐसा महसूस हुआ। यह उसका व्यक्तिगत सत्य है। लेकिन उसी घटना के वस्तुनिष्ठ तथ्य अलग दस्तावेजों से जांचे जा सकते हैं। इसलिए अच्छी आत्मकथा पाठक को अंधविश्वास नहीं, बल्कि विचार और जांच की स्वतंत्रता देती है।

आज की राजनीति केवल संसद, चुनाव और रैलियों तक सीमित नहीं है। यह आख्यानों की भी लड़ाई है। कौन देश के इतिहास को किस दृष्टि से प्रस्तुत करता है? किस नेता को नायक माना जाए? किस निर्णय को उपलब्धि और किसे भूल कहा जाए? किस घटना को याद रखा जाए और किसे भुला दिया जाए?इन सवालों पर समाज में लगातार विमर्श चलता रहता है। किताबें इस विमर्श में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं क्योंकि वे तत्काल राजनीतिक भाषणों की तुलना में अधिक स्थायी होती हैं। सोशल मीडिया पर लिखा गया एक पोस्ट कुछ घंटों में गायब हो सकता है, राजनीतिक भाषण कुछ दिनों में भुलाया जा सकता है, लेकिन एक किताब वर्षों बाद भी पुस्तकालय में मौजूद रहती है। इसीलिए किताब सत्ता के लिए असहज सवाल भी पैदा कर सकती है।

किताब सीधे किसी सरकार को नहीं गिराती है। वह चुनावी गणित नहीं बदलती, संसद में बहुमत नहीं घटाती और सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं करती। लेकिन किताब कुछ और करती है कि वह आधिकारिक कहानी के सामने एक दूसरी कहानी खड़ी कर देती है और कभी-कभी यही ज्यादा शक्तिशाली होता है। क्योंकि सत्ता बदलती रहती है, सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन दस्तावेज लंबे समय तक जीवित रहते हैं। एक किताब आने वाली पीढ़ी को यह कह सकती है कि किसी घटना को देखने का एक दूसरा तरीका भी था। यही लोकतंत्र की बुनियादी शक्ति है।

यदि Belonging: A Journey of Love व्यापक राजनीतिक विमर्श का विषय बनती है, तो पाठक की जिम्मेदारी भी कम नहीं होगी। पुस्तक में लिखी हर बात को अंतिम सत्य मान लेना उतना ही गलत होगा, जितना बिना पढ़े उसे खारिज कर देना। बेहतर तरीका यह है कि पाठक पुस्तक पढ़े, उसमें किए गए दावों को उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों से मिलाए और फिर अपना निष्कर्ष निकाले। लोकतंत्र में पाठक केवल उपभोक्ता नहीं होता है। वह इतिहास का सहभागी भी होता है।

लेखन स्वतंत्र होना चाहिए, लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। लेखक को अपनी बात कहने का अधिकार है, पर उसके शब्द किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, किसी समुदाय की भावना या किसी ऐतिहासिक तथ्य को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए राजनीतिक लेखन में भाषा और तथ्य दोनों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। खासकर आत्मकथा में यह जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि लेखक स्वयं घटनाओं का पात्र भी होता है और उनका कथाकार भी। इस दोहरी भूमिका के कारण आत्मकथा को पढ़ते समय आलोचनात्मक विवेक आवश्यक है।

Belonging: A Journey of Love की वास्तविक ताकत इस बात में नहीं होगी कि वह किसे सही या गलत साबित करती है। उसकी असली ताकत इस बात में होगी कि वह भारतीय राजनीति के किन अनकहे या कम चर्चित पहलुओं को सामने लाती है। क्या उसमें ऐसे प्रसंग होंगे जो पहले से मौजूद राजनीतिक आख्यान को चुनौती देंगे? क्या उसमें निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन के बीच के तनाव सामने आएंगे? क्या उसमें कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार के भीतर के ऐसे अनुभव होंगे जिन्हें सार्वजनिक विमर्श ने अब तक अलग तरीके से देखा है? इन सवालों का उत्तर पुस्तक के प्रकाशन और उसके पाठ से ही मिलेगा। लेकिन पुस्तक के आने से पहले ही उसके आसपास उठ रही बहस यह स्पष्ट कर देती है कि भारत में राजनीतिक स्मृति अभी भी एक जीवंत और संघर्षशील क्षेत्र है।

किताब की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता को तत्काल चुनौती देना नहीं होता है, बल्कि स्मृति को सुरक्षित रखना है। सत्ता का आधिकारिक आख्यान एक समय विशेष में प्रभावशाली हो सकता है। लेकिन उसके समानांतर यदि कोई लेखक अपनी अनुभूति, अपने अनुभव और अपने सवालों को दर्ज कर देता है तो आने वाली पीढ़ियों के पास तुलना करने के लिए दूसरा दस्तावेज मौजूद रहता है। यही कारण है कि Belonging: A Journey of Love को केवल सोनिया गांधी की व्यक्तिगत कहानी के रूप में देखना सीमित दृष्टि होगी। यदि यह पुस्तक भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण अध्यायों को छूती है, तो यह अपने समय के राजनीतिक दस्तावेज का रूप भी ले सकती है। हालांकि किसी भी आत्मकथा को पढ़ते समय भावनात्मक समर्थन या राजनीतिक विरोध के बजाय तथ्य और विवेक को प्राथमिकता देना होगा। क्योंकि सच केवल वही नहीं होता जो लेखक लिखता है और झूठ केवल वही नहीं होता जिसे विरोधी नकार देता है। सच तक पहुंचने के लिए कई दस्तावेजों, कई दृष्टिकोणों और कई आवाजों को साथ पढ़ना पड़ता है और शायद यही किताबों की सबसे बड़ी खूबसूरती होती है।
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