कृषि अनुसंधान परिसर, पटना में 16–22 अगस्त, 2026 तक “21वां पार्थेनियम जागरूकता सप्ताह” आयोजित
पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस , जिसे सामान्यतः कैरट वीड, गाजर घास या कांग्रेस घास के नाम से जाना जाता है, कृषि, जैव विविधता, पशुधन एवं मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करने वाला एक अत्यंत हानिकारक आक्रामक खरपतवार है। देश में लगभग 3.5 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर इसका फैलाव हो चुका है और इसका प्रसार लगातार चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है। यह खरपतवार फसल उत्पादकता में कमी तथा पर्यावरणीय क्षरण के साथ-साथ डर्मेटाइटिस, अस्थमा तथा नाक-त्वचा एवं नाक-श्वसनी संबंधी एलर्जी जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का भी प्रमुख कारण है।
इस आक्रामक खरपतवार की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा अपने अनुसंधान केंद्र एवं कृषि विज्ञान केंद्रों के सहयोग से 16 से 22 अगस्त, 2026 तक “21वां पार्थेनियम जागरूकता सप्ताह” आयोजित किया गया। सप्ताह के दौरान किसानों एवं आम जनता को पार्थेनियम के दुष्प्रभावों तथा इसके प्रभावी प्रबंधन के उपायों के प्रति जागरूक करने के लिए विभिन्न जागरूकता एवं प्रसार गतिविधियां आयोजित की गईं। इन गतिविधियों के माध्यम से वैज्ञानिकों, प्रशासनिक एवं तकनीकी कर्मचारियों, किसानों, विद्यार्थियों तथा खेतिहर श्रमिकों तक पार्थेनियम प्रबंधन संबंधी जानकारी पहुंचाई गई।
जागरूकता सप्ताह के अंतर्गत संस्थान में एक विद्यार्थी संवाद कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इस दौरान संस्थान के वैज्ञानिकों एवं तकनीकी कर्मचारियों ने ए.एन. कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना; महिला महाविद्यालय, एनआईपीईआर, हाजीपुर तथा जे.एन.एल. कॉलेज, खगौल सहित विभिन्न संस्थानों के एम.एससी. एवं पीएच.डी. विद्यार्थियों के साथ संवाद किया। प्रतिभागियों ने पार्थेनियम के दुष्प्रभावों तथा इसके प्रभावी प्रबंधन के विभिन्न उपायों पर सक्रिय रूप से चर्चा की।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने पार्थेनियम के नियंत्रण में जन-जागरूकता एवं सामुदायिक भागीदारी के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि पार्थेनियम के दीर्घकालिक एवं टिकाऊ प्रबंधन के लिए जैविक, सांस्कृतिक तथा अन्य पर्यावरण-अनुकूल उपायों को सम्मिलित करने वाली एकीकृत खरपतवार प्रबंधन रणनीति सबसे प्रभावी विकल्प है।
संस्थान के विभिन्न प्रभागों के प्रमुखों— डॉ. आशुतोष उपाध्याय, प्रमुख, भूमि एवं जल प्रबंधन प्रभाग; डॉ. संजीव कुमार, प्रमुख, फसल अनुसंधान प्रभाग; डॉ. कमल शर्मा, प्रमुख, पशुधन एवं मत्स्य प्रबंधन प्रभाग तथा डॉ. उज्ज्वल कुमार, प्रमुख, सामाजिक-आर्थिक एवं प्रसार प्रभाग ने भी प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने पार्थेनियम के प्रभावी नियंत्रण के लिए व्यावहारिक, सरल एवं कम लागत वाले उपायों पर विस्तार से चर्चा की। इस अवसर पर भूमि एवं जल प्रबंधन प्रभाग की वैज्ञानिक डॉ. सोनका घोष ने “पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस एल. प्रबंधन की रणनीतियां” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने पार्थेनियम की आक्रामक प्रकृति तथा कृषि, जैव विविधता एवं मानव स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों की जानकारी दी। उन्होंने इसके प्रबंधन के लिए भौतिक, सांस्कृतिक, रासायनिक एवं जैविक नियंत्रण विधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने पार्थेनियम के टिकाऊ नियंत्रण में मैक्सिकन बीटल जैसे जैव-नियंत्रण एजेंटों तथा कासिया प्रजातियों, गेंदा और चारा फसलों जैसी प्रतिस्पर्धी पौध प्रजातियों की भूमिका पर भी चर्चा की। डॉ. घोष ने जलवायु परिवर्तन, विशेषकर वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड एवं तापमान में वृद्धि, के पार्थेनियम की वृद्धि, प्रसार एवं प्रबंधन पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के बारे में भी जानकारी दी।
जागरूकता सप्ताह के दौरान संस्थान परिसर में पार्थेनियम उन्मूलन अभियान भी चलाया गया। वैज्ञानिकों, अधिकारियों, तकनीकी कर्मचारियों एवं सहायक कर्मचारियों ने सक्रिय रूप से भाग लेते हुए संस्थान परिसर एवं प्रक्षेत्रों से पार्थेनियम के पौधों को उखाड़कर हटाया।
कार्यक्रम का समन्वय डॉ. सोनका घोष, डॉ. शिवानी, डॉ. राकेश कुमार तथा डॉ. घौस अली, वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। कार्यक्रम के सह-आयोजक के रूप में डॉ. सौरभ कुमार, डॉ. अभिषेक कुमार दुबे, डॉ. मनीषा टम्टा तथा डॉ. रजनी कुमारी ने सहयोग प्रदान किया। कार्यक्रम में श्री विजय बाबू, श्री अभिषेक कुमार, श्री पी.के. सिंह, श्री पी.के. महापात्र तथा श्री उमेश कुमार मिश्र ने तकनीकी सहयोग प्रदान किया। कार्यक्रम का समापन डॉ. मनीषा टम्टा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
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