एच-1बी वीजा पर अमेरिका का 1.03 लाख डॉलर शुल्क का प्रस्ताव
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 29 अगस्त ::
अमेरिका में काम करने का सपना देखने वाले दुनिया भर के कुशल पेशेवरों के लिए एच-1बी वीजा लंबे समय से सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में से एक रहा है। खासकर भारतीय आईटी पेशेवरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए यह वीजा अमेरिकी रोजगार बाजार में प्रवेश का प्रमुख माध्यम है। ऐसे में अमेरिका की ओर से एच-1बी वीजा आवेदनों पर करीब 1.03 लाख डॉलर यानी लगभग 98.92 लाख रुपये का प्रस्तावित शुल्क लगाए जाने की खबर ने वैश्विक स्तर पर चिंता पैदा कर दी है। अमेरिका के गृह सुरक्षा विभाग ने संघीय रजिस्टर में प्रकाशित एक नोटिस में सालाना निर्धारित सीमा के तहत आने वाले एच-1बी वीजा आवेदनों पर 1,03,265 डॉलर शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह राशि मौजूदा एच-1बी आवेदन शुल्क के अतिरिक्त होगी यानि किसी आवेदक या उसके नियोक्ता को पहले से लागू शुल्कों के अलावा यह भारी रकम भी चुकानी पड़ सकती है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो एच-1बी वीजा की पूरी व्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इसका असर केवल कंपनियों और कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिकी तकनीकी उद्योग, भारतीय आईटी क्षेत्र, उच्च शिक्षा और दोनों देशों के बीच पेशेवर आवाजाही पर भी दिखाई दे सकता है।
एच-1बी वीजा अमेरिका का एक गैर-आप्रवासी वीजा कार्यक्रम है, जिसके माध्यम से अमेरिकी कंपनियां विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को रोजगार दे सकती हैं। सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, शोध, वित्त और अन्य विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में इस वीजा की विशेष मांग रहती है। अमेरिका की तकनीकी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय संस्थानों के लिए विदेशी विशेषज्ञों की उपलब्धता लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। दूसरी ओर भारत जैसे देशों के उच्च शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष पेशेवरों के लिए अमेरिका आकर्षक रोजगार बाजार रहा है। एच-1बी वीजा इसी पारस्परिक जरूरत को पूरा करता रहा है। भारतीय पेशेवर बड़ी संख्या में इस कार्यक्रम के माध्यम से अमेरिका पहुंचते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, एच-1बी वीजा पाने वालों में 70 प्रतिशत से अधिक भारतीय हैं। इसलिए प्रस्तावित शुल्क का प्रभाव भारतीय नागरिकों पर विशेष रूप से पड़ने की आशंका है। अब तक एच-1बी वीजा के लिए आवेदन प्रक्रिया में शुल्क कुछ हजार डॉलर के स्तर पर रहा है। प्रस्ताव में 1,03,265 डॉलर की राशि निर्धारित करने का मतलब है कि शुल्क अचानक कई गुना बढ़ जाएगा।
भारतीय मुद्रा में देखें तो यह रकम करीब 98.92 लाख रुपये बैठती है। यह राशि एक सामान्य भारतीय पेशेवर के लिए अत्यंत बड़ी है। हालांकि एच-1बी वीजा की प्रक्रिया में आम तौर पर नियोक्ता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और शुल्क का भुगतान किस स्तर पर होगा, इसका व्यावहारिक प्रभाव संबंधित नियमों पर निर्भर करेगा, फिर भी इतनी बड़ी लागत कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के फैसले को प्रभावित कर सकती है। छोटी और मध्यम अमेरिकी कंपनियों के लिए यह खर्च और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। उन्हें यह तय करना पड़ सकता है कि विदेशी कर्मचारी को नियुक्त करने पर इतना अतिरिक्त खर्च करना उनके लिए आर्थिक रूप से उचित है या नहीं।
इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा असर भारतीय पेशेवरों पर पड़ने की संभावना इसलिए है क्योंकि एच-1बी कार्यक्रम में भारतीयों की हिस्सेदारी बहुत अधिक है। भारत के हजारों तकनीकी विशेषज्ञ हर वर्ष अमेरिकी कंपनियों में रोजगार पाने के लिए एच-1बी वीजा की प्रक्रिया में शामिल होते हैं। इनमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर, डेटा विशेषज्ञ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पेशेवर, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, शोधकर्ता और अन्य तकनीकी कर्मचारी शामिल हैं। यदि नियोक्ताओं की लागत बहुत अधिक बढ़ जाती है तो कंपनियां नए एच-1बी कर्मचारियों की भर्ती को सीमित कर सकती हैं। इससे भारत से अमेरिका जाने वाले नए पेशेवरों के अवसर कम हो सकते हैं। इसका दूसरा असर उन भारतीय छात्रों पर भी पड़ सकता है जो अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वहीं रोजगार की उम्मीद रखते हैं। अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मास्टर डिग्री या उससे ऊपर की डिग्री रखने वाले आवेदकों के लिए एच-1बी की 20,000 वीजा वाली अतिरिक्त श्रेणी भी इस प्रस्ताव में शामिल है।
एच-1बी कार्यक्रम में अमेरिकी विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री या उससे ऊपर की डिग्री रखने वाले उम्मीदवारों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा की व्यवस्था है। सामान्य वार्षिक सीमा के साथ यह श्रेणी विदेशी छात्रों के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है। नए प्रस्ताव में इस अतिरिक्त श्रेणी को भी शामिल किया गया है। इसका अर्थ है कि उच्च शिक्षा हासिल करने वाले विदेशी छात्रों के लिए भी यह लागत एक बड़ी चुनौती बन सकती है। अमेरिका में पढ़ाई करने वाले कई भारतीय छात्र अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार के माध्यम से वहां करियर बनाने की योजना बनाते हैं। यदि एच-1बी वीजा की लागत अत्यधिक बढ़ती है तो छात्रों और विश्वविद्यालयों को भी अपनी भविष्य की रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
एच-1बी वीजा पर भारी शुल्क लगाने का असर केवल विदेशी कर्मचारियों पर नहीं होगा। अमेरिकी कंपनियां भी इसके सीधे प्रभाव में आएंगी। तकनीकी उद्योग में कई कंपनियां विशेष कौशल वाले कर्मचारियों की कमी को पूरा करने के लिए विदेशी प्रतिभाओं पर निर्भर करती हैं। यदि प्रत्येक एच-1बी आवेदन पर करीब एक लाख डॉलर से अधिक का अतिरिक्त शुल्क लगने लगे तो कंपनियों की भर्ती लागत में भारी वृद्धि होगी। बड़ी कंपनियां संभवतः इस अतिरिक्त खर्च को वहन करने की क्षमता रखती हों, लेकिन स्टार्टअप और छोटी कंपनियों के लिए स्थिति अलग हो सकती है। इससे कंपनियां स्थानीय कर्मचारियों की भर्ती बढ़ाने, विदेशों में तकनीकी केंद्र स्थापित करने या कुछ पदों को स्वचालित करने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती हैं।
एच-1बी वीजा को लेकर अमेरिकी राजनीति में लंबे समय से बहस होती रही है। एक पक्ष का तर्क है कि विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति से अमेरिकी नागरिकों के रोजगार अवसर प्रभावित हो सकते हैं। दूसरा पक्ष मानता है कि उच्च कौशल वाले विदेशी पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था, नवाचार और तकनीकी प्रतिस्पर्धा को मजबूत करते हैं। प्रस्तावित शुल्क इसी बहस को एक नए स्तर पर ले जा सकता है। यदि विदेशी पेशेवरों की भर्ती महंगी होती है तो कुछ कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता दे सकती हैं। इससे कुछ क्षेत्रों में स्थानीय रोजगार बढ़ सकता है। लेकिन दूसरी ओर, यदि कंपनियों को जरूरी विशेषज्ञ नहीं मिलते हैं तो उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और उन्नत तकनीक जैसे क्षेत्रों में प्रतिभाओं की वैश्विक प्रतिस्पर्धा पहले ही तेज है।
भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक तथा तकनीकी संबंध पिछले वर्षों में लगातार मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच आईटी सेवाओं, निवेश, शिक्षा और उच्च तकनीकी क्षेत्रों में गहरे संबंध है। भारतीय पेशेवरों की अमेरिका में बड़ी मौजूदगी इन संबंधों की महत्वपूर्ण कड़ी है। ऐसे में एच-1बी वीजा से जुड़ा कोई बड़ा नीतिगत बदलाव केवल आव्रजन नीति का मामला नहीं रहेगा, बल्कि द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों में भी चर्चा का विषय बनेगा। भारत के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय परिवारों की शिक्षा और रोजगार संबंधी योजनाएं अमेरिकी अवसरों से जुड़ी हुई हैं।
प्रस्तावित शुल्क अचानक सामने आया मुद्दा नहीं है। एच-1बी वीजा को लेकर अमेरिकी प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था के बीच भी विवाद देखने को मिला है। यह प्रस्ताव उस घटनाक्रम के करीब एक महीने बाद आया है, जिसमें एक संघीय अपील अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें जिला न्यायाधीश के आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई थी। जिला न्यायाधीश ने ट्रंप प्रशासन की एच-1बी वीजा आवेदनों पर 1,00,000 डॉलर शुल्क लगाने की योजना को रद्द कर दिया था। अब 1,03,265 डॉलर शुल्क का नया प्रस्ताव सामने आने से एच-1बी व्यवस्था एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है।
भारत का आईटी उद्योग लंबे समय से अमेरिकी बाजार से गहराई से जुड़ा हुआ है। भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिकी ग्राहकों को सॉफ्टवेयर, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल सेवाएं प्रदान करती हैं। यदि अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति की लागत बढ़ती है तो भारतीय कंपनियों को अपनी अमेरिकी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। कंपनियां अमेरिका में स्थानीय स्तर पर अधिक नियुक्तियां कर सकती हैं या भारत से दूरस्थ रूप से सेवाएं देने का मॉडल बढ़ा सकती है। हालांकि इसका अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रस्ताव किस रूप में लागू होता है और किन आवेदनों पर इसकी वास्तविक बाध्यता होगी।
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और लंबे समय से वैश्विक प्रतिभाओं का केंद्र रहा है। लेकिन आज कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और कई अन्य देश भी कुशल विदेशी पेशेवरों को आकर्षित करने के लिए अपनी नीतियों को आसान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यदि अमेरिका में एच-1बी वीजा की लागत अत्यधिक बढ़ती है तो कुछ विदेशी पेशेवर दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं। इससे वैश्विक प्रतिभा के लिए अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर भी सवाल उठ सकते हैं। भारत के युवा पेशेवरों के लिए भी विदेश में करियर के विकल्प बढ़ सकते हैं। अमेरिका के अलावा यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के कुछ देश तकनीकी विशेषज्ञों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं।
अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या काफी बड़ी है। इनमें से अनेक छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिकी कंपनियों में नौकरी करना चाहते हैं। एच-1बी वीजा उनके लिए रोजगार से दीर्घकालिक करियर तक पहुंचने का महत्वपूर्ण माध्यम बनता है। यदि कंपनियां भारी शुल्क के कारण ऐसे कर्मचारियों को प्रायोजित करने से पीछे हटती हैं तो छात्रों के लिए नौकरी और वीजा के बीच का रास्ता कठिन हो सकता है। इससे अमेरिका में उच्च शिक्षा लेने के फैसले पर भी कुछ छात्रों और परिवारों को आर्थिक दृष्टि से दोबारा विचार करना पड़ सकता है।
अभी यह प्रस्ताव है, अंतिम व्यवस्था नहीं। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगे अमेरिकी प्रशासन इसे किस स्वरूप में लागू करता है। कानूनी चुनौतियां भी इसकी राह में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतना भारी शुल्क वास्तव में किस पर पड़ेगा और इसका प्रभाव एच-1बी वीजा की पूरी प्रक्रिया पर कितना व्यापक होगा। इसके अलावा कंपनियां और पेशेवर इस लागत का सामना किस प्रकार करेंगे, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
एच-1बी वीजा पर 1,03,265 डॉलर का प्रस्तावित शुल्क केवल एक प्रशासनिक शुल्क वृद्धि नहीं है। यह अमेरिका की आव्रजन, रोजगार और वैश्विक प्रतिभा नीति में संभावित बड़े बदलाव का संकेत माना जा सकता है। भारतीय पेशेवरों के लिए इसकी चिंता इसलिए अधिक है क्योंकि एच-1बी वीजा पाने वालों में 70 प्रतिशत से अधिक भारतीय बताए जाते हैं। अमेरिकी कंपनियों के लिए भी यह फैसला भर्ती लागत और प्रतिभा चयन की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। एक ओर अमेरिका स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देने और आव्रजन व्यवस्था को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर उसकी अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर की कुशल प्रतिभाओं की जरूरत है। यही विरोधाभास इस पूरे प्रस्ताव को महत्वपूर्ण बनाता है। यदि प्रस्ताव लागू होता है तो आने वाले समय में इसका असर भारतीय आईटी पेशेवरों, छात्रों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और भारत-अमेरिका तकनीकी संबंधों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है। फिलहाल दुनिया की निगाहें इस बात पर हैं कि अमेरिका इस भारी शुल्क वाले प्रस्ताव को अंतिम रूप देता है या कानूनी और आर्थिक दबावों के बीच इसमें कोई बदलाव करता है।
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