व्हाट्सएप, फेक न्यूज और डिजिटल युग में समाज की चुनौतियां

व्हाट्सएप, फेक न्यूज और डिजिटल युग में समाज की चुनौतियां

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 03 जुलाई ::

आज का भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जा रहे हैं। बंदूकें, टैंक और मिसाइलें अब भी अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनसे कहीं अधिक प्रभावशाली एक नया हथियार हमारे हाथों में आ चुका है “स्मार्टफोन”। यह छोटा-सा उपकरण केवल संवाद का माध्यम नहीं रहा, बल्कि विचारों, सूचनाओं, भावनाओं और जनमत को नियंत्रित करने का सबसे शक्तिशाली साधन बन गया है। विशेष रूप से व्हाट्सएप, जो कभी परिवार और मित्रों के बीच बातचीत का आसान माध्यम माना जाता था, आज सूचना के प्रवाह का ऐसा नेटवर्क बन चुका है जिसकी पहुँच देश के सबसे दूरस्थ गाँव तक है।

भारत में करोड़ों लोग प्रतिदिन व्हाट्सएप का उपयोग करते हैं। सुबह उठते ही शुभकामना संदेशों से लेकर रात तक राजनीतिक बहसों, धार्मिक विचारों, वीडियो, समाचारों और तरह-तरह की सूचनाओं का आदान-प्रदान इसी मंच पर होता है। लेकिन इसी सुविधा के साथ एक गंभीर संकट भी जन्म ले चुका है। अब व्हाट्सएप केवल संवाद का मंच नहीं रहा, बल्कि जनमत निर्माण, समाज को प्रभावित करने और कई बार उसे विभाजित करने का माध्यम भी बन गया है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि झूठी सूचनाएँ, आधे-अधूरे तथ्य और भ्रामक संदेश सत्य की तुलना में कहीं अधिक तेजी से फैलते हैं। एक व्यक्ति द्वारा भेजा गया गलत संदेश कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुँच सकता है और कुछ घंटों में लाखों लोगों तक। इस प्रक्रिया में सत्य अक्सर पीछे छूट जाता है, जबकि अफवाहें सामाजिक वास्तविकता का रूप धारण कर लेती हैं। यही कारण है कि आज डिजिटल सूचना के इस युग को समझना और उससे जुड़े खतरों को पहचानना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। मानव सभ्यता का इतिहास सूचना के विकास का इतिहास भी है। कभी संदेश पहुँचाने के लिए दूत भेजे जाते थे। फिर पत्रों का युग आया। उसके बाद टेलीफोन, रेडियो और टेलीविजन ने संचार व्यवस्था को बदल दिया। लेकिन इंटरनेट और स्मार्टफोन ने जिस गति से दुनिया को बदला है, उसका कोई ऐतिहासिक उदाहरण नहीं मिलता।

भारत में इंटरनेट क्रांति के बाद सूचना का लोकतंत्रीकरण हुआ। अब केवल समाचार संस्थान ही सूचना के स्रोत नहीं रहे। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं एक प्रकाशक बन गया। उसके पास कैमरा है, रिकॉर्डिंग की सुविधा है, सोशल मीडिया अकाउंट है और लाखों लोगों तक पहुँचने की क्षमता है। यह परिवर्तन कई दृष्टियों से सकारात्मक था। इससे आम नागरिकों को अपनी बात रखने का मंच मिला। ग्रामीण क्षेत्रों तक सूचना पहुँची। शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सेवाओं का विस्तार हुआ। लेकिन इसी लोकतंत्रीकरण के साथ सूचना की गुणवत्ता और सत्यता की समस्या भी सामने आई। पहले किसी समाचार को प्रकाशित होने से पहले कई स्तरों की जाँच से गुजरना पड़ता था। संपादक, रिपोर्टर और संस्थान उसकी जिम्मेदारी लेते थे। आज कोई भी व्यक्ति बिना किसी सत्यापन के किसी भी सूचना को हजारों लोगों तक पहुँचा सकता है। यही स्थिति फेक न्यूज़ की सबसे बड़ी ताकत बन गई है।

जब व्हाट्सएप की शुरुआत हुई थी, तब इसका उद्देश्य सरल और सुरक्षित संवाद उपलब्ध कराना था। इसकी लोकप्रियता का कारण इसकी सरलता थी। फोन नंबर के आधार पर संपर्क स्थापित करना आसान था। परिवार, मित्र, विद्यालय, कार्यालय और सामाजिक समूहों के लिए यह आदर्श मंच बन गया। धीरे-धीरे व्हाट्सएप समूहों की संख्या बढ़ती गई। अब एक व्यक्ति सैकड़ों समूहों का हिस्सा हो सकता है। इनमें परिवार, जातीय समूह, धार्मिक संगठन, राजनीतिक समर्थक, व्यापारिक नेटवर्क और स्थानीय समुदाय शामिल हैं। यहीं से एक नई समस्या का जन्म हुआ। जब किसी समूह में कोई संदेश आता है, तो अधिकांश लोग उसे बिना सत्यापन के स्वीकार कर लेते हैं। यदि संदेश भेजने वाला व्यक्ति परिचित हो, तो उस पर विश्वास और बढ़ जाता है।

मनोविज्ञान की भाषा में इसे “ट्रस्ट ट्रांसफर” कहा जाता है। अर्थात व्यक्ति सूचना पर नहीं, बल्कि सूचना भेजने वाले पर विश्वास करता है। यही कारण है कि झूठी खबरें भी तेजी से फैल जाती हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी समूह में यह संदेश आए कि किसी विशेष समुदाय ने कोई घटना की है, या किसी स्थान पर हिंसा होने वाली है, तो बहुत से लोग बिना जाँच किए उसे आगे बढ़ा देते हैं। कुछ ही समय में यह संदेश सैकड़ों समूहों तक पहुँच जाता है और अफवाह वास्तविकता जैसी प्रतीत होने लगती है।

यह समझना आवश्यक है कि लोग झूठी खबरों पर विश्वास क्यों कर लेते हैं। इसके पीछे कई मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। भय- मनुष्य स्वाभाविक रूप से खतरों के प्रति संवेदनशील होता है। यदि कोई संदेश भय उत्पन्न करता है, तो लोग उसे तुरंत साझा करते हैं। जैसे- “आज रात शहर में दंगा होने वाला है।” “फलाँ समुदाय के लोग हमला करने की तैयारी कर रहे हैं।” “बच्चों का अपहरण करने वाला गिरोह सक्रिय है।” ऐसे संदेश लोगों के मन में डर पैदा करते हैं और वे बिना सत्यापन के उन्हें आगे बढ़ा देते हैं। पूर्वाग्रह - यदि कोई सूचना पहले से मौजूद धारणाओं के अनुरूप हो, तो लोग उसे आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। इसे “कन्फर्मेशन बायस” कहा जाता है। यदि किसी व्यक्ति के मन में पहले से किसी समूह के प्रति नकारात्मक धारणा है, तो उससे जुड़ी झूठी खबर भी उसे सच लग सकती है। समूह पहचान- लोग अपने समूह की मान्यताओं के अनुसार सोचने लगते हैं। यदि किसी समूह में बार-बार एक ही प्रकार की सूचनाएँ साझा होती हैं, तो धीरे-धीरे सदस्य उन्हें सत्य मानने लगते हैं। तात्कालिकता- “अभी शेयर करें।” “तुरंत सबको भेजें।” “यह संदेश सरकार नहीं दिखाएगी।” ऐसे शब्द लोगों को बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित करते हैं।

डिजिटल दुनिया में शुरू हुई अफवाहें कई बार वास्तविक दुनिया में हिंसा का कारण बन जाती हैं। भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ सोशल मीडिया पर फैली झूठी सूचनाओं ने सामाजिक तनाव और हिंसा को जन्म दिया। एक झूठी तस्वीर, पुराना वीडियो या संपादित क्लिप लोगों की भावनाओं को भड़का सकती है। जब भावनाएँ तर्क पर हावी हो जाती हैं, तब भीड़ का व्यवहार बदल जाता है। भीड़ व्यक्तिगत जिम्मेदारी को समाप्त कर देती है। सामान्य परिस्थितियों में जो व्यक्ति हिंसा नहीं करेगा, वह भी भीड़ का हिस्सा बनकर उग्र हो सकता है। इसी कारण डिजिटल अफवाहें केवल तकनीकी समस्या नहीं हैं; वे कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी बन चुकी हैं।

लोकतंत्र में निर्णय विचार-विमर्श, तथ्य और संवाद के आधार पर लिए जाते हैं। लेकिन सोशल मीडिया के दौर में एक नई प्रवृत्ति उभर रही है जिसे “डिजिटल भीड़तंत्र” कहा जा सकता है। इसमें तथ्य से अधिक महत्व भावनाओं को मिलता है। कोई वीडियो वायरल हो जाए तो लोग अदालत का निर्णय आने से पहले ही दोषी तय कर देते हैं। कोई संदेश हजारों बार साझा हो जाए तो वह सत्य जैसा दिखाई देने लगता है। किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय के खिलाफ ऑनलाइन अभियान चलाया जाए तो उसकी प्रतिष्ठा कुछ घंटों में प्रभावित हो सकती है। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती बनती जा रही है क्योंकि न्याय का आधार प्रमाण होते हैं, जबकि डिजिटल भीड़ का आधार भावनाएँ होती हैं।

किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूँजी विश्वास होता है। जब नागरिक एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, तब सामाजिक सौहार्द बना रहता है। लेकिन यदि लगातार ऐसी सूचनाएँ प्रसारित की जाएँ जो समुदायों, जातियों, धर्मों और क्षेत्रों के बीच संदेह पैदा करें, तो समाज का ताना-बाना कमजोर होने लगता है। आज सोशल मीडिया पर अनेक ऐसे संदेश देखे जा सकते हैं जो लोगों को “हम” और “वे” में बाँटते हैं। धीरे-धीरे यह विभाजन सामाजिक व्यवहार में भी दिखाई देने लगता है। लोग दूसरे समुदायों के बारे में वास्तविक अनुभवों के आधार पर नहीं, बल्कि व्हाट्सएप पर प्राप्त संदेशों के आधार पर राय बनाने लगते हैं। यही स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए खतरनाक होती है। क्योंकि जब नागरिक एक-दूसरे पर विश्वास खो देते हैं, तब राष्ट्रीय एकता कमजोर होने लगती है।

21वीं सदी में युद्ध की परिभाषा बदल रही है। अब केवल सैन्य शक्ति ही पर्याप्त नहीं है। किसी देश की सामाजिक स्थिरता, जनमत और सूचना तंत्र भी रणनीतिक महत्व रखते हैं। इसीलिए आज “इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर” अर्थात सूचना युद्ध की चर्चा होती है। इस युद्ध में लक्ष्य दुश्मन की सेना नहीं, बल्कि उसके नागरिकों का मन होता है। यदि किसी समाज में भ्रम, अविश्वास और विभाजन पैदा कर दिया जाए, तो उसकी सामूहिक शक्ति कमजोर हो जाती है। सोशल मीडिया इस प्रकार के अभियानों के लिए अत्यंत प्रभावी मंच बन गया है। इसी कारण डिजिटल सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है।
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