लोकतंत्र में जनता किसी की बपौती नहीं होती
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 29 अक्टूबर ::
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां जनता के पास विकल्प भले ही सीमित हो, लेकिन अपने मत के माध्यम से अपनी भावनाओं, अपेक्षाओं और नाराजगी को व्यक्त करने की शक्ति उसके पास हमेशा रहती है। जनता कभी-कभी खुलकर बोलती है, कभी मौन रहकर अपना संदेश देती है और कभी ऐसा फैसला सुना देती है, जिसकी गूंज राजनीतिक गलियारों में लंबे समय तक सुनाई देती है। लोकतंत्र में जनता की इस भाषा को जो राजनीतिक दल और नेता जितनी जल्दी समझ लेते हैं, उनके लिए अपनी गलतियों को सुधारना उतना ही आसान होता है। इसके विपरीत, जो नेता जनता के संकेतों को अपनी लोकप्रियता के शोर में दबा देते हैं, उन्हें एक दिन अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती हुई दिखाई देती है।
पटना की राजनीति से लेकर बिहार की सत्ता के गलियारों तक आज यही सवाल प्रासंगिक है कि क्या भारतीय जनता पार्टी जनता के बदलते मिजाज को समझ रही है? क्या पार्टी के नेता यह मान बैठे हैं कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता ही हर चुनाव में उनकी जीत की गारंटी है? क्या पटना की जनता को भाजपा का परंपरागत मतदाता मान लेना उसकी राजनीतिक भूल नहीं है? और क्या नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति में अप्रासंगिक मानने वाले लोग उनकी राजनीतिक क्षमता को ठीक से पहचान पाए हैं? इन सवालों के जवाब केवल चुनावी आंकड़ों में नहीं है, बल्कि जनता की मनःस्थिति को समझने में छिपे हैं।
राजनीति में किसी क्षेत्र को अपना स्थायी गढ़ मान लेना सबसे बड़ी भूलों में से एक है। आज जिस क्षेत्र में कोई दल मजबूत दिखाई देता है, कल वहीं का मतदाता उससे सवाल पूछ सकता है। जनता का समर्थन कोई स्थायी संपत्ति नहीं, बल्कि भरोसे की पूंजी है। यह पूंजी जनहित, सुशासन, संवाद और जवाबदेही से बढ़ती है तथा अहंकार, उपेक्षा और आत्ममुग्धता से घटती है।
पटना को लंबे समय से भाजपा का मजबूत राजनीतिक क्षेत्र माना जाता रहा है। राजधानी की कई विधानसभा सीटों पर पार्टी की पकड़ ने उसके नेताओं में स्वाभाविक आत्मविश्वास पैदा किया है। लेकिन आत्मविश्वास और अति-आत्मविश्वास के बीच बहुत महीन अंतर होता है। जब कोई राजनीतिक दल अपने परंपरागत समर्थन को अपरिवर्तनीय मानने लगता है, तब वह मतदाता की बदलती प्राथमिकताओं को पढ़ने में चूक सकता है। बांकीपुर जैसी सीट से भाजपा को यह सीख लेने की जरूरत है कि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक जीतते रहने का अर्थ यह नहीं है कि जनता हमेशा बिना सवाल किए उसी दल को चुनती रहेगी। हर चुनाव में मतदाता उम्मीदवार के व्यवहार, स्थानीय समस्याओं, विकास कार्यों, जनसंपर्क और राजनीतिक संदेश का मूल्यांकन करता है। पार्टी का नाम और शीर्ष नेतृत्व की लोकप्रियता महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर जनता से जुड़ाव का विकल्प नहीं बन सकते।
भाजपा ने पटना की राजनीतिक परिस्थितियों से समय रहते सबक लिया होता, तो संभव है कि विधान परिषद की सीट को लेकर पैदा हुई चुनौती का सामना अलग तरीके से किया जा सकता था। हालांकि किसी चुनावी परिणाम के पीछे कई कारक होते हैं, इसलिए किसी एक कारण को निर्णायक मान लेना उचित नहीं होगा। फिर भी राजनीतिक संकेतों की अनदेखी करना किसी भी दल के लिए जोखिम भरा है।
नरेन्द्र मोदी भारतीय राजनीति के प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं। उनकी लोकप्रियता, चुनाव प्रचार की शैली और समर्थकों के बीच उनकी स्वीकार्यता ने भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत राजनीतिक आधार दिया है। इसमें संदेह नहीं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व ने पार्टी की चुनावी रणनीति और राजनीतिक पहचान को नया स्वरूप प्रदान किया है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का लाभ हर राज्य, हर क्षेत्र और हर उम्मीदवार को समान रूप से मिलता रहेगा? राजनीति में किसी शीर्ष नेता की लोकप्रियता चुनावी सफलता में योगदान जरूर देती है, लेकिन वह स्थानीय नेतृत्व की कमजोरी, जनविरोध या प्रशासनिक असंतोष को हमेशा ढक नहीं सकती। राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय नेता और स्थानीय स्तर पर जनता के बीच स्वीकार्य प्रतिनिधि, दोनों की भूमिकाएं अलग-अलग होती हैं। एक की ताकत दूसरे की जिम्मेदारी समाप्त नहीं करती।
बिहार में भाजपा के कुछ नेताओं की राजनीतिक कार्यशैली पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वे अपने काम और जनसंपर्क के आधार पर जनता का भरोसा अर्जित कर रहे हैं, अथवा केवल मोदी की छवि के सहारे अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बनाए रखने की उम्मीद कर रहे हैं। 'मोदी है तो मुमकिन है' का नारा एक समय राजनीतिक ऊर्जा और विश्वास का प्रतीक बना। लेकिन किसी नारे की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनता को अपने जीवन में बदलाव कितना दिखाई देता है। सड़क, बिजली, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, महंगाई और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे मतदाता के दैनिक अनुभव का हिस्सा है। इन सवालों का जवाब केवल किसी राष्ट्रीय नेता की लोकप्रियता से नहीं दिया जा सकता है। भाजपा को यह समझना होगा कि मोदी के नाम पर चुनाव जीतने की अपेक्षा रखने वाले नेताओं को भी अपने क्षेत्र में काम करके दिखाना होगा। जनता को यह महसूस होना चाहिए कि उसका प्रतिनिधि उसके बीच मौजूद है, उसकी समस्याएं सुनता है और समाधान के लिए प्रयास करता है। अन्यथा शीर्ष नेतृत्व की लोकप्रियता के बावजूद स्थानीय असंतोष चुनावी नुकसान में बदल सकता है।
भाजपा के नेताओं को नरेन्द्र मोदी की छवि नहीं, नरेन्द्र मोदी के परिश्रम से सीखना चाहिए। किसी लोकप्रिय नेता की छवि धारण कर लेना और उसकी कार्यशैली से सीखना दो अलग बातें हैं। यदि कोई नेता केवल मोदी के नाम, तस्वीर और नारे के सहारे अपनी राजनीतिक पहचान बनाना चाहता है, तो वह नेतृत्व के वास्तविक अर्थ को सीमित कर देता है। नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक सफलता के पीछे लंबे समय तक संगठनात्मक काम, जनसंपर्क, प्रभावशाली संवाद और चुनावी रणनीति का योगदान रहा है। उनके समर्थक उनकी निर्णायक नेतृत्व शैली को पसंद करते हैं। लेकिन भाजपा के दूसरे नेताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने क्षेत्र में जनता के साथ वैसा ही प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करें।
बिहार की राजनीति की अपनी सामाजिक संरचना, क्षेत्रीय आकांक्षाएं और नेतृत्व की परंपरा है। यहां मतदाता केवल राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर निर्णय नहीं करता। जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, सामाजिक सम्मान, विकास, कल्याणकारी योजनाएं और राजनीतिक गठबंधन भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसलिए बिहार के भाजपा नेताओं को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि मोदी की लोकप्रियता उन्हें हर परिस्थिति में राजनीतिक सुरक्षा प्रदान करती रहेगी। जनता राष्ट्रीय नेतृत्व को पसंद करते हुए भी स्थानीय उम्मीदवार से नाराज हो सकती है। वह गठबंधन का समर्थन करते हुए भी किसी विशेष दल को उसकी सीमाएं याद दिला सकती है। लोकतंत्र में मतदाता की यही स्वतंत्रता राजनीतिक दलों को सतर्क रखती है।
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का नाम केवल एक मुख्यमंत्री या एक दल के नेता के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने लंबे समय तक राज्य की राजनीति को प्रभावित किया है। उनके साथ समर्थकों का एक ऐसा वर्ग जुड़ा रहा है, जो सुशासन, सामाजिक समीकरण, राजनीतिक स्थिरता और उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान को महत्व देता है। नीतीश कुमार की राजनीति के समर्थक और आलोचक, दोनों हैं। उनके कार्यकाल की उपलब्धियों पर चर्चा हो सकती है, उनकी नीतियों की आलोचना भी की जा सकती है और उनके राजनीतिक फैसलों पर प्रश्न भी उठाए जा सकते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें समाप्त मान लेना बिहार की राजनीतिक वास्तविकताओं को सरल बनाकर देखने जैसा होगा।
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषताओं में से एक रही है परिस्थितियों के अनुरूप अपनी रणनीति बदलने की क्षमता। उनके राजनीतिक सफर में कई उतार-चढ़ाव आए, गठबंधन बदले और राजनीतिक समीकरणों में परिवर्तन हुए। इसके बावजूद वे बार-बार अपनी प्रासंगिकता साबित करने में सफल रहे हैं। यही कारण है कि उन्हें कमजोर या अप्रासंगिक मानने वाले नेताओं को उनके राजनीतिक प्रभाव का आकलन केवल वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर नहीं करना चाहिए। बिहार में सामाजिक समीकरणों की समझ, गठबंधन प्रबंधन और मतदाताओं के अलग-अलग वर्गों तक पहुंच बनाने की क्षमता अब भी महत्वपूर्ण है।
पटना की विधान परिषद सीट को लेकर उभरे राजनीतिक संकेतों को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यदि नीतीश कुमार से जुड़े राजनीतिक समीकरणों ने भाजपा के सामने चुनौती खड़ी की है, तो यह इस बात की याद दिलाता है कि गठबंधन की राजनीति में किसी सहयोगी की ताकत को कम करके आंकना नुकसानदेह हो सकता है।
भाजपा और जनता दल (यूनाइटेड) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी रहे हैं, लेकिन दोनों दलों की राजनीतिक पहचान, संगठनात्मक संरचना और मतदाताओं तक पहुंचने के तरीके पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। भाजपा की ताकत उसका व्यापक संगठन, राष्ट्रीय नेतृत्व, वैचारिक आधार और चुनावी प्रबंधन है। वहीं जदयू की राजनीति में नीतीश कुमार का व्यक्तित्व, बिहार की सामाजिक परिस्थितियों की समझ और राज्यस्तरीय राजनीतिक समीकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह अंतर दोनों दलों के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। भाजपा को अपनी राष्ट्रीय शक्ति के साथ बिहार की स्थानीय राजनीतिक संवेदनशीलताओं को समझना होगा। जदयू को भी अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने के लिए जनता के भरोसे और संगठनात्मक सक्रियता पर ध्यान देना होगा। गठबंधन की सफलता केवल सीटों के बंटवारे या चुनावी मंचों पर एक साथ दिखाई देने से सुनिश्चित नहीं होती है। इसके लिए दोनों दलों के बीच परस्पर सम्मान, राजनीतिक संतुलन और सहयोगियों की ताकत की वास्तविक पहचान जरूरी है। यदि भाजपा अपने सहयोगी को कमजोर समझने लगे और जदयू अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को केवल नीतीश कुमार के व्यक्तित्व पर निर्भर छोड़ दे, तो दोनों के लिए समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि भाजपा नीतीश कुमार की राजनीतिक उपयोगिता को समझे और जदयू भी बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अपने संगठन को मजबूत करे।
भारतीय राजनीति में कांग्रेस का इतिहास एक महत्वपूर्ण सबक देता है। कभी देश की राजनीति में लगभग एकछत्र प्रभाव रखने वाली कांग्रेस को समय के साथ अनेक राज्यों में अपने जनाधार के क्षरण का सामना करना पड़ा। इसके पीछे कई ऐतिहासिक, संगठनात्मक, वैचारिक और नेतृत्व संबंधी कारण रहे। क्षेत्रीय दलों का उभार, स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी, संगठन की कमजोरियां और जनता की बदलती अपेक्षाएं भी अलग-अलग समय पर महत्वपूर्ण साबित हुई। भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक वर्चस्व स्थायी नहीं होता। जो दल कभी अपराजेय दिखाई देते हैं, वे भी जनता के असंतोष और संगठनात्मक कमजोरी के कारण अपनी जमीन खो सकते हैं। कांग्रेस के अतीत को केवल उसके विरोधियों की विफलता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है; उससे यह सीखना भी जरूरी है कि कोई दल अपने पुराने गौरव के भरोसे अनिश्चितकाल तक राजनीति नहीं कर सकता।
भाजपा आज कई राज्यों में मजबूत स्थिति में है और उसके पास व्यापक संगठनात्मक संसाधन हैं। लेकिन मजबूत स्थिति का अर्थ यह नहीं कि भविष्य की चुनौतियां समाप्त हो गई हैं। यदि पार्टी के भीतर आत्ममंथन की जगह आत्ममुग्धता ले ले, स्थानीय नेताओं की जवाबदेही कमजोर हो जाए और जनता की नाराजगी को विपक्ष का दुष्प्रचार कहकर खारिज किया जाने लगे, तो राजनीतिक क्षरण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा का भविष्य कांग्रेस जैसा ही होगा। दोनों दलों की परिस्थितियां, संगठन और राजनीतिक आधार अलग है। लेकिन इतिहास का सामान्य नियम स्पष्ट है कि जनता से दूरी बनाने वाला कोई भी दल हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं रह सकता है।
राजनीति में व्यक्तित्व का महत्व असंदिग्ध है, लेकिन किसी भी नेता की शारीरिक ऊर्जा, समय और सक्रियता की अपनी सीमाएं होती हैं। नरेन्द्र मोदी भी इस मानवीय वास्तविकता से अलग नहीं है। किसी नेता की उम्र या शारीरिक क्षमता को लेकर अटकलें लगाने के बजाय राजनीतिक दलों को इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि नेतृत्व का संस्थागत विकास किस तरह हो रहा है। क्या भाजपा में अगली पीढ़ी के नेतृत्व को पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं? क्या राज्यस्तरीय नेता अपने दम पर जनता का भरोसा अर्जित कर रहे हैं? क्या पार्टी की चुनावी रणनीति किसी एक चेहरे पर अत्यधिक निर्भर होती जा रही है? और क्या संगठन में ऐसे नेताओं की पर्याप्त तैयारी है, जो भविष्य में नई चुनौतियों का सामना कर सकें? ये प्रश्न मोदी के नेतृत्व को कमतर आंकने के लिए नहीं है, बल्कि किसी भी बड़े राजनीतिक संगठन की दीर्घकालिक मजबूती के लिए आवश्यक हैं।
'मोदी है तो मुमकिन है' का नारा अपनी जगह है, लेकिन लोकतंत्र में यह भी उतना ही जरूरी है कि भाजपा के कार्यकर्ता और नेता अपने काम से यह विश्वास पैदा करें कि पार्टी केवल एक व्यक्ति के भरोसे नहीं, बल्कि मजबूत संगठन, जवाबदेह नेतृत्व और जनसमर्थन के आधार पर आगे बढ़ सकती है। किसी भी दल के लिए सबसे बड़ी सफलता तब होती है, जब उसका शीर्ष नेतृत्व प्रेरणा का स्रोत बना रहे और स्थानीय नेतृत्व अपनी जिम्मेदारी स्वयं निभाने में सक्षम हो।
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सत्ता को चुनौती देने, सरकार से सवाल पूछने और जनता के सामने वैकल्पिक दृष्टिकोण रखने की होती है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने कई मुद्दों पर केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास किया है। उनकी राजनीतिक शैली और रणनीति से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन विपक्ष की उपस्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक अंग है। यदि भाजपा यह मानकर चलती है कि विपक्ष कमजोर है और उसके सामने कोई गंभीर चुनौती नहीं है, तो यह सोच भी उसके लिए नुकसानदेह हो सकती है। लोकतंत्र में विपक्ष की कमजोरी सत्ता पक्ष को स्थायी सुरक्षा नहीं देती। कई बार स्थानीय असंतोष, क्षेत्रीय नेतृत्व और अप्रत्याशित राजनीतिक गठजोड़ चुनावी परिणामों को प्रभावित कर देते हैं।
यह भी सही है कि राहुल गांधी की राजनीतिक भूमिका और कांग्रेस की संगठनात्मक क्षमता पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन भाजपा को अपनी रणनीति विपक्ष की कमियों के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी उपलब्धियों और जनता की अपेक्षाओं के आधार पर तय करनी चाहिए। विपक्ष की कमजोरी पर निर्भर रहने वाला दल अपनी आंतरिक कमजोरियों को पहचानने में देर कर सकता है। सत्ता पक्ष के लिए वास्तविक चुनौती यह नहीं है कि विपक्ष कितना मजबूत है, बल्कि यह है कि जनता उसके शासन से कितनी संतुष्ट है। यदि जनता संतुष्ट है, तो विपक्ष की आलोचना का प्रभाव सीमित रह सकता है। यदि जनता असंतुष्ट है, तो कमजोर विपक्ष भी उसके लिए राजनीतिक विकल्प बन सकता है।
पटना की राजनीति भाजपा के लिए आत्ममंथन का अवसर हो सकती है। उसे यह समझना होगा कि परंपरागत गढ़ों में समर्थन बनाए रखने के लिए निरंतर जनसंपर्क, स्थानीय समस्याओं का समाधान और नेताओं की जवाबदेही जरूरी है। केवल राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता के आधार पर राजनीतिक भविष्य की गारंटी नहीं दी जा सकती है। इसी तरह जदयू और नीतीश कुमार के लिए भी यह समय आत्मसमीक्षा का है। राजनीतिक अनुभव और सामाजिक समीकरणों की समझ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बदलते बिहार की आकांक्षाओं को पूरा करना ही किसी नेता की दीर्घकालिक प्रासंगिकता का आधार बन सकता है।
जनता का मत केवल किसी उम्मीदवार को जिताने या हराने का साधन नहीं है। वह राजनीतिक दलों को दिशा दिखाने का माध्यम भी है। कभी वह समर्थन देकर आगे बढ़ने का अवसर देती है, तो कभी नाराजगी जताकर सुधार का संकेत देती है। जो नेता इस संदेश को समझ लेते हैं, वे अपनी गलतियों से सीखते हैं। जो इसे अनदेखा करते हैं, वे धीरे-धीरे जनता के विश्वास से दूर हो जाते हैं।
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि कोई भी राजनीतिक दल हमेशा सत्ता में बने रहने की गारंटी लेकर नहीं आता। जनता का समर्थन अर्जित करना पड़ता है और उसे बनाए रखने के लिए निरंतर काम करना पड़ता है। यही नियम भाजपा पर भी लागू होता है, कांग्रेस पर भी और बिहार में जदयू सहित सभी राजनीतिक दलों पर भी।
नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता भाजपा की महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी है, लेकिन उस पूंजी का सही उपयोग तभी संभव है, जब पार्टी के दूसरे नेता भी अपनी जिम्मेदारी निभाएं। नीतीश कुमार की राजनीतिक प्रासंगिकता को नकारना भी उतनी ही बड़ी भूल होगी, जितनी किसी नेता को अजेय मान लेना। पटना की राजनीतिक परिस्थितियां यदि कोई संदेश दे रही हैं, तो वह यही है कि राजनीति में कोई भी समीकरण स्थायी नहीं होता है।
भाजपा को समझना होगा कि जनता किसी की बपौती नहीं है। उसे यह भी समझना होगा कि मोदी की छवि का लाभ तभी तक मिलता रहेगा, जब तक पार्टी जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतरती रहेगी। जदयू को भी यह याद रखना होगा कि नीतीश कुमार का अनुभव तभी तक प्रभावी रहेगा, जब तक वह जनता के भरोसे और बदलती परिस्थितियों से जुड़ा रहेगा। अंततः लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है। उसके पास विकल्प कम हों, तब भी उसका मत राजनीतिक दलों को आईना दिखाने की क्षमता रखता है। इस आईने में अपनी छवि पहचानना ही परिपक्व नेतृत्व की निशानी है। जो दल समय रहते अपनी कमियां सुधार लेता है, उसके लिए भविष्य के रास्ते खुले रहते हैं। जो दल अपनी लोकप्रियता को स्थायी सत्ता का प्रमाणपत्र मान लेता है, उसके लिए इतिहास कभी भी अप्रत्याशित मोड़ ले सकता है। इसलिए भाजपा हो या जदयू, कांग्रेस हो या कोई अन्य दल, सबके लिए एक ही संदेश है जनता के संकेतों को समझिए, अपने अहंकार पर नियंत्रण रखिए और जनादेश को सर्वोपरि मानिए। क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता चाहे कितनी ही मजबूत क्यों न दिखाई दे, उसका वास्तविक आधार जनता का विश्वास ही होता है।
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